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रविवार, 22 अप्रैल 2012

पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल पर विशेष

Earth day, 22 April

ग्लोबल वार्मिंग आज पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई है। सबसे अजीब बात यह है कि जो विकसित देश इस समस्या के लिए अधिक जिम्मेदार हैं वहीं विकासशील व अन्य देशों पर इस बात के लिए दबाव बना रहे हैं कि वो ऐसा विकास न करें जिससे धरती का तापमान बढ़े। हालांकि वो खुद अपनी बात पर अमल नहीं करते लेकिन दूसरों देशों को शिक्षा देते हैं। बहरहाल बात चाहे जो हो विभिन्न देशों के आपसी विवाद में नुकसान केवल हमारी पृथ्वी का ही है।
पृथ्वी पर कल-कल बहती नदियां, माटी की सोंधी महक, विशाल महासागर, ऊंचे-ऊंचे पर्वत, तपते रेगिस्तान सभी जीवन के असंख्य रूपों को अपने में समाए हुए हैं। वास्तव में अन्य ग्रहों की अपेक्षा पृथ्वी पर उपस्थित जीवन इसकी अनोखी संरचना, सूर्य से दूरी एवं अन्य भौतिक कारणों के कारण संभव हो पाया है। इसलिए हमें पृथ्वी पर मौजूद जीवन के विभिन्न रूपों का सम्मान और सुरक्षा करनी चाहिए। परंतु पिछले कुछ दहाईयों के दौरान मानवीय गतिविधियों एवं औद्योगिक क्रांति के कारण पृथ्वी का अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा है। दिशाहीन विकास के चलते इंसानों ने प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया है। परिणामस्वरूप आज हवा, पानी और मिट्टी अत्यधिक प्रदूषित हो चुके हैं। इस प्रदूषण के कारण कहीं लाइलाज गंभीर बीमारियां फैल रही हैं तो कहीं फसलों की पैदावार प्रभावित हो रही है। कोयला, पेट्रोल, केरोसिन जैसे जीवाश्म ईंधनों के दहन से वातावरण में ऐसी गैसों की मात्रा बढ़ रही है जिससे पृथ्वी के औसत तापमान में इजाफा हो रहा है यानी ग्लोबल वार्मिंग की समस्या उत्पन्न होती जा रही है। जो अन्य जीवों के साथ-साथ मानव के अस्तित्व के लिए भी खतरा उत्पन्न कर रहा है।

इसकी महत्ता को समझते हुए प्रत्येक वर्ष 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरूआत सर्वप्रथम 1970 में संयुक्त राज्य अमेरिका से किया गया था। तभी से स्वच्छ पर्यावरण के लिए जागरूकता बढ़ाने के लिए पूरे विश्व में प्रतिवर्ष पृथ्वी दिवस मनाया जाने लगा है। असल में विश्व पृथ्वी दिवस ऐसा अवसर है जब हम पृथ्वी को जीवनदायी बनाए रखने का संकल्प ले सकते हैं। इस साल पृथ्वी दिवस की 42वीं वर्षगांठ की वैश्विक थीम ‘मोबलाइज द अर्थ’ यानी पृथ्वी प्रदत्त संसाधनों का उपयोग करना एवं संकटों से उसकी रक्षा करना है। सूरज से पृथ्वी की दूरी करीब 14 करोड़ 96 लाख किलोमीटर है। यह दूरी ही पृथ्वी ग्रह को पूरे सौर मंडल में विशिष्ट स्थान देती है। इसी दूरी के कारण यहां पानी से भरे महासागर बने, ऊंचे पहाड़ बने, रेगिस्तान, पठार और सूरज की लगातार मिलती ऊर्जा और पृथ्वी के गर्भ में मौजूद ताप से यहां जीवन के विभिन्न रूप संभव हुए हैं।

पेड़-पौधे और अन्य वनस्पतियां, पशु-पक्षी तथा इंसान रूपी जीव-जंतु, यहां तक कि सूक्ष्मजीव आदि भी यहां जीवन के लिए अति आवश्यक हैं इन सब में ऊर्जा का स्रोत सूर्य की ऊष्मा ही है। कैसा अजब संयोग है कि सूर्य से यह दूरी मिलने के साथ-साथ पृथ्वी एक कोण पर झुकी हुई है, जिस कारण अलग-अलग ऋतुएं, मौसम, जलवायु यहां बने और जीवन में विविधता पैदा हुई। इस ग्रह पर प्रकृति को जीवन जुटाने में लाखों वर्ष लगे। धरती पर कई जटिल प्रणालियां पूरे सामंजस्य से लगातार कार्य करती रहती हैं, जिस कारण जीवन हर रंग-रूप में फल-फूल रहा है। पृथ्वी पर मौजूद जीवनदायी पानी के कारण ही यह ग्रह अंतरिक्ष से नीला दिखाई देता है। सूर्य और पृथ्वी के आपसी मेलजोल से ही इसके आसपास, हवाओं और विभिन्न गैसों का आवरण बना यानी वायुमंडल का निर्माण हुआ। इसी वायुमंडल की चादर ने सूर्य की हानिकारक किरणें जो जीवन को नुकसान पहुंचा सकती हैं, उन्हें पृथ्वी पर पहुंचने से रोके रखा है।

कितने आश्चर्य की बात है कि हजारों वर्षों से वायुमंडल की विभिन्न परतों में गैसों का स्तर एक ही बना हुआ है। जीवन की शुरूआत भले ही पानी में हुई परंतु इसी जीवन को बनाए रखने के लिए प्रकृति ने ऐसा पर्यावरण दिया कि हर कठिन परिस्थिति से निपटने में जीवन सक्षम हो सका है। पर्यावरण का मतलब होता है हमारे या किसी वस्तु के आसपास की परिस्थितियों या प्रभावों का जटिल मेल जिसमें वह वस्तु, व्यक्ति या जीवन स्थित है या विकसित होते हैं। इन परिस्थितियों द्वारा उनके जीवन या चरित्र में बदलाव आते हैं या तय होते हैं। पूरे विश्व में आजकल पर्यावरण शब्द का काफी उपयोग किया जा रहा है। कुछ लोग पर्यावरण का मतलब जंगल और पेड़ों तक ही सीमित रखते हैं, तो कुछ जल और वायु प्रदूषण से जुड़े पर्यावरण के पहलुओं को ही अपनाते हैं। आजकल लोग ग्लोबल वार्मिंग यानी भूमण्डलीय तापन मतलब गर्माती धरती और ओजोन के छेद तक पर्यावरण को सीमित कर देते हैं, तो कई परमाणु ऊर्जा एवं बड़े-बड़े बांधों का बहिष्कार कर सौर ऊर्जा और छोटे बांधों को अपनाने की बात कह कर अपना पर्यावरण के प्रति दायित्व पूरा समझ लेते हैं।

ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर पर्यावरण की वास्तविक परिभाषा है क्या? सर्वप्रथम तो हमें यह तय करना होगा कि हम किस वस्तु या प्राणी विशेष के पर्यावरण की व्याख्या कर रहे हैं। फिर पर्यावरण का अर्थ समझना आसान है। उदाहरण के लिए हमारे अपने पर्यावरण का अर्थ होगा, हमारे आसपास की हर वह वस्तु चाहे वह सजीव हो या निर्जीव जिसका हम पर या हमारे रहन-सहन पर या हमारे स्वास्थ्य पर एवं हमारे जीवन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, निकट या दूर भविष्य में, कोई प्रभाव हो सकता है और साथ ही ऐसी हर वस्तु जिस पर हमारे कारण कोई प्रभाव पड़ सकता है। यानी पर्यावरण में हमारे आसपास की सभी घटनाओं जैसे मौसम, जलवायु आदि का समावेश होता है, जिन पर हमारा जीवन निर्भर करता है। यह सृजनात्मक प्रकृति जिसने हमें जीवन और जीवन के लिए आवश्यक वातावरण दिया है एक बहुत ही नाजुक संतुलन पर टिकी है। अगर हम वायुमंडल को ही लें, तो संपूर्ण वायुमंडल सबसे उपयुक्त गैसों के अनुपात से बना है जो जीवन के हर रूप, उसकी विविधता को संजोए रखने में सक्षम है।

वायुमंडल में 78.08 प्रतिशत नाइट्रोजन, 20.95 प्रतिशत ऑक्सीजन, 0.03 कार्बन डाइऑक्साइड तथा करीब 0.96 प्रतिशत अन्य गैसे हैं। गैसों का यह अनुपात सभी प्रकार के जीवों के पनपने के लिए उपयुक्त है। व्यापक तौर पर देखें तो ऑक्सीजन पृथ्वी पर उपस्थित जीवों के लिए अतिआवश्यक है। यह हमारे शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा प्रदान करती है। हम जो खाना खाते हैं, उसे पचाकर हमें ताकत मिलती है। यदि इसी ऑक्सीजन का अनुपात 21 प्रतिशत से ज्यादा हो जाए तो हमारे शरीर की कोशिकाओं में कई प्रकार के असंतुलन उत्पन्न हो जाएंगे जिससे बहुत सी विकृतियां आ जाएंगी। ऐसे में सारी क्रियाएं और अभिक्रियाएं गड़बड़ा जाएंगी। इसके साथ-साथ जीवन के लिए जरूरी वनस्पति तथा हाइड्रोकार्बन के अणुओं का भी नाश शुरू हो जाएगा यानी ऑक्सीजन के वर्तमान स्तर में थोड़ी-सी भी वृद्धि जीवन के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। अब इसी ऑक्सीजन का प्रतिशत 20 से कम हो तो हमें सांस लेने में तकलीफ हो जाएगी। सारी चयापचयी गतिविधियां रुक जाएंगी और ऊर्जा न मिल पाने से जीवन का नामोनिशां मिट जाएगा।

इसी तरह 78.08 प्रतिशत नाइट्रोजन की मात्रा वायुमंडल में ऑक्सीजन के हानिकारक प्रभाव तथा जलाने की क्षमता पर सही रोक लगाने में सक्षम होती है। वायुमंडल में गैसों का यह मौजूदा स्तर, पेड़-पौधों में प्रकाश-संश्लेषण के लिए भी बिल्कुल ठीक है। प्रकृति का नाजुक संतुलन और संयोग यही है कि हर जीवन किसी न किसी रूप में जीवन की धारा के अविरल बहाव में मदद कर रहा है, जैसे वनस्पतियों के लिए आवश्यक कार्बन डाइऑक्साइड प्राणियों द्वारा छोड़ी जाती है और पौधे इस कार्बन डाइऑक्साइड को सूरज की रोशनी पानी की मौजूदगी में प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपने लिए ऊर्जा बनाने के काम में लाते हैं। इस दौरान कार्बन डाइऑक्साइड को अपने में समा कर ऑक्सीजन बाहर छोड़ते हैं। ऐसे ही और संतुलन एवं आपसी मेल-जोल के उदाहरण आगे दिए जाएंगे। अभी हम सृजनात्मक प्रकृति के अनूठे संयोग की बात करते हैं, जिसने जीवन के लिए जरूरी पर्यावरण संजोया।

पहले बताई गई गैसों की तरह कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर भी बिल्कुल उपयुक्त है। क्योंकि इस अनुपात में यह पृथ्वी की ऊष्मा को अंतरिक्ष में खो जाने से रोकती है यानी कार्बन डाइऑक्साइड जीवन के लिए उपयुक्त तापमान को बनाए रखती है। परन्तु यदि इसी कार्बन डाइऑक्साइड का प्रतिशत अधिक हो गया तो पूरे ग्रह के तापमान में भयानक बढ़ोतरी हो सकती है जो जीवन के लिए अनुकूल नहीं होगा। पृथ्वी पर मौजूद पेड़-पौधे इस कार्बन डाइऑक्साइड को निरंतर ऑक्सीजन में बदलते रहते हैं। यह मात्रा करीब 190 अरब टन ऑक्सीजन प्रतिदिन बैठती है। इसी तरह अन्य स्रोतों से पौधों के लिए आवश्यक कार्बन डाइऑक्साइड बनती रहती है। इन सभी गैसों का स्तर विभिन्न परस्पर जटिल प्रक्रियाओं के सहयोग से हमेशा स्थिर बना रहता है और जीवन सांसे लेता रहता है।

वायुमंडलीय गैसों के अलावा पृथ्वी का आकार भी जीवन के पनपने के लिए उपयुक्त है। यदि पृथ्वी का द्रव्यमान थोड़ा कम होता तो उसमें गुरुत्वाकर्षण भी अपर्याप्त रहता और इस कम खिंचावों के कारण पृथ्वी की चादर यानी पूरा वायुमंडल ही अंतरिक्ष में बिखर जाता और अगर यही द्रव्यमान कुछ ज्यादा हो जाता तो सारी गैसें पृथ्वी में ही समां जाती, जिससे जीवों की श्वसन प्रक्रिया प्रभावित होती। पृथ्वी पर अगर गुरुत्वाकर्षण ज्यादा होता तो वायुमंडल में अमोनिया और मिथेन की मात्रा अधिक होती। ये गैसें जीवन के लिए घातक हैं। ऐसे ही अगर गुरुत्व कम होता तो पृथ्वी पानी ज्यादा खो देती। पिछले 10 हजार वर्षों में असाधारण रूप से पृथ्वी पर पानी की मात्रा ज्यों की त्यों है यानी कुछ पानी बर्फ के रूप में जमा हुआ है, कुछ बादलों के रूप में तो काफी महासागरों में, फिर भी पानी की मात्रा में एक बूंद भी कमी नहीं आई है। भूमि पर बरसने वाला पानी पूरी पृथ्वी पर होने वाली वर्षा का 40 प्रतिशत होता है और हम सिर्फ 1 या 2 प्रतिशत पानी ही संरक्षित कर पाते हैं बाकी सारा पानी वापस समुद्र में बह जाता है।

हवा का तापमान और नमी के गुण भी कई कारकों से प्रभावित होते हैं। जैसे भूमि तथा सागरों का विस्तार, क्षेत्र की स्थलाकृति तथा सौर किरणों की तीव्रता में मौसम के अनुसार भिन्नता। ये सभी कारक लगातार आपसी मेल से हमारी धरती के मौसम को नया स्वरूप और विविधता प्रदान करते हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में नाइट्रोजन और ऑक्सीजन के अलावा कई अन्य गैसें हैं जो पृथ्वी पर जीवन पनपाने लायक वातावरण बनाती हैं।
इसी तरह अगर पृथ्वी की परत ज्यादा मोटी होती तो वह वायुमंडल से ज्यादा ऑक्सीजन सोखती और जीवन फिर संकट में पड़ जाता। अगर यह परत ज्यादा पतली होती तो लगातार ज्वालामुखी फटते रहते और धरती की सतह पर भूगर्भीय गतिविधियां इतनी अधिक होतीं कि भूकम्प आदि के बीच में जीवन बचा पाना असंभव हो जाता। ऐसे ही महत्वपूर्ण और नाजुक संतुलन का उदाहरण है, वायुमंडल में ओजोन गैस का स्तर जिसे धरती की छतरी भी कहते हैं। अगर ओजोन की मात्रा वर्तमान के स्तर से ज्यादा होती तो धरती का तापमान बहुत कम होता और अगर कम हो तो धरती का तापमान बहुत ज्यादा हो जाएगा और पराबैंगनी किरणें भी धरती की सतह पर ज्यादा टकराती। हमारे द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के नाश को समझने से पहले यह आवश्यक है कि पर्यावरण से संबंधित प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को समझें, क्योंकि तभी हम पर्यावरणीय समस्याओं का सही हल ढूंढ पाएंगे।

पृथ्वी की सतह के ऊपर वायुमंडलीय गैसों का एक नाजुक संतुलन है और गैसों का यह संतुलन सूरज, पृथ्वी और ऋतुओं से प्रभावित होता है। वायुमंडल पृथ्वी की मौसम प्रणाली और जलवायु का एक जटिल घटक है। वायुमंडल अपनी विभिन्न परतों से गुजरती सौर किरणों में से हानिकारक ऊष्मा सोख लेता है। जो सौर किरणें धरती तक पहुंचती हैं, वे उसकी सतह से टकराकर वापस ऊपर की ओर आती हैं। इन किरणों में से आवश्यक ऊष्मा को वायुमंडल फिर अपने में समा लेता है और धरती के तापमान के जीवन के अनुकूल बनाए रखने में मदद करता है। वायुमंडल में मौजूद ऊष्मा का स्तर कई मौसमी कारकों को प्रभावित करता है, जिसमें वायु की गतिविधियां, हमारे द्वारा महसूस किया जाने वाला तापमान तथा वर्षा शामिल है। महासागरों से नमी का वाष्पन वायुमंडलीय जल-वाष्प पैदा करता है और अनुकूल परिस्थितियों में यही वायुमंडल मौजूद जल-वाष्प वर्षा, हिमपात, ओलावृष्टि तथा वर्षण के अन्य रूपों में वापस धरती की सतह पर पहुंच जाते हैं।

हवा का तापमान और नमी के गुण भी कई कारकों से प्रभावित होते हैं। जैसे भूमि तथा सागरों का विस्तार, क्षेत्र की स्थलाकृति तथा सौर किरणों की तीव्रता में मौसम के अनुसार भिन्नता। ये सभी कारक लगातार आपसी मेल से हमारी धरती के मौसम को नया स्वरूप और विविधता प्रदान करते हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में नाइट्रोजन और ऑक्सीजन के अलावा कई अन्य गैसें हैं जो पृथ्वी पर जीवन पनपाने लायक वातावरण बनाती हैं। जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, निऑन, हीलियम, मिथेन, क्रिपटॉन, नाइट्रस ऑक्साइड, हाइड्रोजन आदि। इनमें से किसी भी गैस का असंतुलन जीवन का संतुलन बिगाड़ सकता है। हमें पृथ्वी पर मंडरा रहे खतरों को समझने की जरूरत है। पृथ्वी को इन खतरों से बचाने की सर्वाधिक जिम्मेदारी इसके सर्वश्रेष्ठ प्राणी यानि मानव के कंधों पर ही है। इसलिए हमें अपनी भूमिका समझ कर पृथ्वी को जीवनमय बनाए रखने की दिशा में कदम उठाने होंगे। ग्लोबल वार्मिंग आज पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई है। सबसे अजीब बात यह है कि जो विकसित देश इस समस्या के लिए अधिक जिम्मेदार हैं वहीं विकासशील व अन्य देशों पर इस बात के लिए दबाव बना रहे हैं कि वो ऐसा विकास न करें जिससे धरती का तापमान बढ़े।

हालांकि वो खुद अपनी बात पर अमल नहीं करते लेकिन दूसरों देशों को शिक्षा देते हैं। बहरहाल बात चाहे जो हो विभिन्न देशों के आपसी विवाद में नुकसान केवल हमारी पृथ्वी का ही है। इसलिए पृथ्वी को जीवनमयी बनाए रखने के लिए हम सभी को एक होना होगा। सामूहिक प्रयासों के द्वारा ही हम धारणीय विकास करते हुए पृथ्वी को बचा सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम सभी अपने-अपने स्तर पर ऐसे कार्य करें जिससे प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जा सके। ऊर्जा के नवीकरणीय संसाधनों जैसे पवन ऊर्जा एवं सौर ऊर्जा का उपयोग करना होगा। साथ ही पानी और ऊर्जा की बर्बादी को रोक कर ऐसे अन्य प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना होगा क्योंकि इन्हीं संसाधनों पर हमारा और हमारी भावी पीढ़ियों का भविष्य टिका है। ऐसे में पृथ्वी दिवस को केवल एक समारोह के रूप में लेने से हम इसके वास्तविक लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते हैं बल्कि इस अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति को प्राकृतिक संसाधनों का समझदारी से उपयोग करना सीखना होगा तभी यह धरती भविष्य में मानव की आवश्यकताओं को पूरा करती हुई जीवन के रूपों को संवारती रहेगी।

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

संकट में पानी


समुद तटीय इलाकों और सागरों पर पर्यावरण को विनाश करने वाली क्रियाओं के कारण महासागर भारी खतरे में है।

- महासागर एक गतिशील और जटिल व्यवस्था है जो जीवन के लिए अत्यन्त महत्तवपूर्ण है। महासागरों में मौजूद असीम सम्पदा समान रूप से वितरित नहीं है। उदाहरण के लिए, सर्वाधिक समुद्री जैव विविधता समुद्र तल पर पाई जाती है। महासागरों की उत्पादकता को निर्धारित करने वाली पर्यावरणीय परिस्थितियां समय और स्थान के अनुसार भिन्न-भिन्न हैं।

- सर्वाधिक महत्तवपूर्ण फिशिंग ग्राउंड समुद्र तट से 200 से भी कम मील क्षेत्र के भीतर महाद्वीपीय समतलों पर पाए जाते हैं। ये फिशिंग ग्राउंड भी असमान रूप से देखे गए हैं और अधिकांशत: स्थानीय हैं।

- 2004 में आधे से भी अधिक समुद्र लैंडिंग फिशिंग, समुद्र तट के 100 किमी. के भीतर पकड़ी गई है, जिसकी गहराई आमतौर पर 200 मी. है और यह विश्व के महासागरों का 7.5 फीसदी से भी कम दायरा कवर करता है।

- ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज ने महासागरों की उत्पादकता और स्थायित्व के लिए बहुत सी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों में उथले पानी में, तापमाप में, 3 डिग्री से 0 डिग्री तक की वृद्धि 2100 तक वार्षिक या द्विवार्षिक मूंगों का सफाया हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि 2080 तक विश्व में 80-100 फीसदी तक मूंगें खत्म हो जाएंगे।



जब वातावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है तब कार्बन महासागरों में एकत्रित हो जाता है और एक प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रिया के तहत उसका अम्लीकरण होने लगता है जिसका प्रभाव ठंडे पानी, मूगों और सीपियों पर पड़ता है।

- समुद्र तटों पर और जमीन में विकासात्मक क्रियाएं 2050 तक, आवासीय समुद्रतटों की क्रियाओं की अपेक्षा अधिक प्रभावित कर सकती है और पूरे समुद्र प्रदूषण के 80 फीसदी से भी अधिक खतरा पैदा कर सकती हैं।

- बढ़ता हुआ विकास, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन सभी मृत समुद्री क्षेत्र (कम ऑक्सीजन वाले क्षेत्र) बढ़ा रहे हैं। बहुत से तो प्राथमिक फिशिंग ग्राउंड पर या उसके आसपास है, जो फिश स्टॉक को भी प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे क्षेत्र 2013 में 149 से बढ़कर 2006 में 200 से भी अधिक हो गए हैं।

- आक्रामक प्रजातियां भी प्राथमिक फिशिंग ग्राउंड के लिए खतरा हैं। गिट्टी पोत (पानी, जो बन्दरगाहों और खाड़ी से, जहाजों द्वारा स्थिरता बनाए रखने के लिए ले जाया जाता है) भी आक्रामक प्रजातियों को लाने में महत्वपूर्ण तत्व हैं।

- महासागरों की देखभाल के लिए आंकड़ों और धन का अभाव, समुद्री पर्यावरण को और ज्यादा बदतर बना रहा है। देशों को समुद्रों पर जलवायु और गैर-जलवायुगत दवाबों को कम करने के लिए तत्काल उपाय करना चाहिए ताकि संसाधनों को बचाया जा सके। इसके लिए दुनिया भर में सामुद्रिक नीतियों में परिवर्तन की आवश्यकता है।

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

प्रगतिशील वनविनाश


Author: 
 सोशल वॉच की रिपोर्ट
थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क फिचर्स
तंजानिया में वर्ष 1990 एवं 2005 के मध्य वन क्षेत्र में 15 प्रतिशत की कमी आई है और बढ़ती गरीबी के चलते लकड़ी का उपयोग भी बढ़ा है। वहीं सेनेगल और सोमालिया में स्थानीय एवं निर्यात के लिए कोयला बनाने की वजह से वनों का बड़े पैमाने पर विनाश हो रहा है। यही स्थिति सूडान की भी है। द सोशल वॉच 2011 की मलेशिया की राष्ट्रीय रिपोर्ट इस खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा कर रही है कि स्थानीय समुदाय वनों के विनाश से न केवल अपनी जीविका ही खो रहा है बल्कि वनों की विलुप्ति के साथ उसकी पारम्परिक जीवनशैली एवं संस्कृति भी विलुप्त हो रही है।
विश्व आर्थिक संकट की ही तरह वन विनाश के भी कई कारण सामने आ रहे हैं। इसमें प्रमुख हैं बाजार में मूल उत्पादों और कृषि भूमि की मांग में वृद्धि, गरीबी की बढ़ती समस्या, जलवायु परिवर्तन, पेड़ों का लकड़ी एवं ईंधन के लिए कटना। उपरोक्त निष्कर्ष सोशल वॉच रिपोर्ट - 2012 से सामने आए हैं। पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा के बढ़ते मूल्यों के चलते निर्धनतम वर्ग द्वारा एक बार पुनः लकड़ी एवं कोयले के इस्तेमाल करने की वजह से भी वन संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। लेकिन यह दुष्चक्र जारी है। वनों के विलुप्त होने से हमारे ग्रह की कार्बन सोखने की क्षमता में आई कमी के परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन से निपट पाना भी कठिन होता जा रहा है। कानूनों में व्याप्त ढिलाई के कारण भी समस्या और गहराती जा रही है। रिपोर्ट के यूरोप से संबंधित अध्याय में ‘इंडिजेनाडोय’ में चेतावनी देते हुए बताया गया है कि यूरोपीय संघ की अपने पशुधन के लिए चारे हेतु विदेशों पर निर्भरता ने ‘विदेशों में भूमि की मांग में हुई वृद्धि’ की वजह से विश्व भर में वनों का सामाजिक विनाश सामने आ रहा है।
वैश्विक विकास को लेकर प्राथमिक घोषणापत्र (रियो $ 20 के आगे: न्याय के बिना कोई भविष्य नहीं) में तेजी से फैलते अस्थिर उत्पादन एवं उपभोग की प्रवृत्ति को प्राकृतिक संसाधनों में तेजी से हो रही कमी के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। इसी प्रवृत्ति को वैश्विक तापमान में वृद्धि, अतिवादी मौसम की निरन्तर आवृत्ति, रेगिस्तानीकरण एवं वनों के विनाश के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। रिपोर्ट में फिनलैंड द्वारा किए जा रहे वनों के विनाश का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि ‘वर्तमान में कई मुख्य फिनिश कंपनियां जो कि स्वयं को विश्व की सर्वोच्च कंपनी मानती हैं, के ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जिसमें उनके द्वारा अधिक संख्या में यूकेलिप्टस के लगाए जाने से आबादी का पलायन हुआ है एवं बड़ी मात्रा में भूमि हथियाई गई है।’ रिपोर्ट के अनुसार यहां की कमोवेश राज्य के स्वामित्व वाली कंपनी ‘नेस्ले आईल’ जो कि विश्व में बायो ईंधन में अग्रणी होने को तड़प रही है, ने मुख्यतया मलेशिया, इंडोनेशिया में व्यापक स्तर पर भूमि एवं वर्षा वनों के उपयोग में परिवर्तन कराया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये क्षेत्र निर्विवाद रूप से विश्व में सर्वाधिक कार्बन सोखने का कार्य करते थे। यहां नेस्ले की रिफायनरियों को तेल आपूर्ति हेतु आरक्षित भूमि करीब 7 लाख हेक्टेयर है।

जाम्बिया की स्थिति तो और भी विकट है। पिछले दशक में यहां प्रतिवर्ष औसतन 3 लाख हेक्टेयर वन नष्ट होने का अनुमान था। लेकिन मात्र एक वर्ष 2008 में 8 लाख हेक्टेयर वन कम हुए हैं। वर्ष 1990 एवं 2010 के मध्य देश में वनों के क्षेत्र में 6.3 प्रतिशत या 33 लाख हेक्टेयर की कमी आई है। ब्राजील में भी वनों की कटाई एवं अमेजन वनों में लगी आग कमोवेश ‘कृषि के विस्तार’ का परिणाम ही कही जाएगी। वहीं दूसरी ओर ताकतवर लॉबी के कारण वन नियमावली में परिवर्तन कर अमेजन में पारम्परिक वन का अनुपात 80 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है। पेरु का अमेजन वन क्षेत्र दुनिया का आठवां एवं लेटिन अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा वन क्षेत्र है। पिछले कई दशकों से यहां के वन भी घरों के लिए ईंधन के साथ ही साथ कटाई एवं खेती के लिए वन जलाने हेतु प्रचलित पद्धति के कारण विनाश की ओर अग्रसर हैं। यहां पर मैंग्रोव वनों एवं शुष्क तथा अर्द्ध शुष्क वनों का क्षेत्र प्रतिवर्ष करीब 1,50,000 हेक्टेयर सिकुड़ रहा है।

ग्वाटेमाला में अमीर देशों के लिए गन्ना एवं निकारागुआ में कॉफी की एकल खेती की वजह से भी वनों को हानि पहुंची है। निकारागुआ के कृषि निर्यात मॉडल की वजह से ‘प्रगतिशील वन विनाश’ हुआ है। 1980 के दशक में जब कोको की कीमतों में कमी आई तो सरकार ने उत्पादन में वृद्धि के लिए अपने उष्णकटिबंधीय वनों का और अधिक विनाश किया। ग्वाटेमाला में रस निकालने एवं घरों के लिए ईंधन की वजह से वहां के पारम्परिक वन 80 हजार हेक्टेयर प्रतिवर्ष की दर से कम हो रहे हैं और यदि यही स्थिति बनी रही तो इस देश में वर्ष 2040 तक वनों का नामोनिशान मिट जाएगा।



निकारागुआ में अवैध कटाई, कृषि विस्तार एवं वनों में आग, जो कि अक्सर जानबूझकर फसलों हेतु नई भूमि प्राप्त करने के लिए लगाई जाती है, की वजह से प्रतिवर्ष 75,000 हेक्टेयर वनों का विनाश हो रहा है। यहां के घरों में खाने पकाने का 76 प्रतिशत ईंधन लकड़ियों से प्राप्त होता है। मौजूदा 1.2 करोड़ हेक्टेयर वनों में से 80 लाख हेक्टेयर वन बर्बाद हो चुके हैं। यही स्थिति पनामा की भी है यहां वर्ष 1970 में वन क्षेत्र 70 प्रतिशत था, जो कि वर्ष 2011 में घटकर 35 प्रतिशत ही रह गया है। अर्जेंटीना में वर्ष 1937 से 1987 के मध्य करीब 23553 वर्ग किलोमीटर वन नष्ट हुए वहीं वर्ष 1998 से 2006 के मध्य प्रतिवर्ष करीब 2500 वर्ग किलोमीटर वनों का विनाश हुआ। यानि यहां प्रति दो मिनट में एक हेक्टेयर वन विलुप्त हो जाता है। देश की राष्ट्रीय रिपोर्ट इसके लिए वनों का असंगठित रूप से दोहन, कृषि क्षेत्र के विस्तार, सार्वजनिक नीतियों की कमी एवं पारम्परिक प्रजातियों के पुनः वनीकरण हेतु निजी क्षेत्र को दिए जाने वाले प्रोत्साहन को जिम्मेदार ठहराती है।

म्यांमार (बर्मा) में वन एवं खनन कानूनों का क्रियान्वयन नहीं होता। इसी वजह से वर्ष 1990 एवं 2005 के मध्य यहां पर 25 प्रतिशत वनों का विनाश हुआ लेकिन उसके परिणामों पर कोई विचार ही नहीं करता। फिलीपींस में भी उपरोक्त समस्याएं बड़े पैमाने पर मौजूद हैं, जिसके परिणामस्वरूप वहां का वन क्षेत्र 40 प्रतिशत घटकर 27 प्रतिशत रह गया है। वहीं श्रीलंका तो अपने मूल वनों में से महज 1.5 प्रतिशत वनों को ही सुरक्षित रख पाया है। रिपोर्ट में इसकी वजह ब्रिटिश साम्राज्यकालीन औपनिवेशिक नीतियों को बताया है जिसके तहत रबर, कॉफी एवं चाय के बागान हेतु बड़ी मात्रा में वन काटे गए थे। इतना ही नहीं वर्ष 1990 से 2005 तक चले आंतरिक संघर्षों की वजह से वहां विश्व के प्राथमिक वनों को सर्वाधिक नुकसान पहुंचा और इसकी वजह से बचे हुए वनों का भी 18 प्रतिशत नष्ट हो गया। वर्ष 2004 के बाद नवनिर्माण की पहल के चलते वनों के विनाश में और अधिक तेजी आई है।

मध्य अफ्रीकी गणतंत्रों में खाद्य असुरक्षा (जलवायु परिवर्तन की वजह से) के चलते किसान अपनी खेती का क्षेत्र बढ़ाने हेतु वनों को काट रहे हैं। यहां की 90 प्रतिशत आबादी द्वारा खाना पकाने के लिए लकड़ी के इस्तेमाल की वजह से स्थितियां और भी बदतर हो रही हैं। नाईजीरिया में किसानों के साथ शिकारी भी जल्दी शिकार के लिए वनों को जला रहे हैं। तंजानिया में वर्ष 1990 एवं 2005 के मध्य वन क्षेत्र में 15 प्रतिशत की कमी आई है और बढ़ती गरीबी के चलते लकड़ी का उपयोग भी बढ़ा है। वहीं सेनेगल और सोमालिया में स्थानीय एवं निर्यात के लिए कोयला बनाने की वजह से वनों का बड़े पैमाने पर विनाश हो रहा है। यही स्थिति सूडान की भी है। द सोशल वॉच 2011 की मलेशिया की राष्ट्रीय रिपोर्ट इस खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा कर रही है कि स्थानीय समुदाय वनों के विनाश से न केवल अपनी जीविका ही खो रहा है बल्कि वनों की विलुप्ति के साथ उसकी पारम्परिक जीवनशैली एवं संस्कृति भी विलुप्त हो रही है।

क्या मैदानी क्या रेतीली- सभी जगह पानी की कमी

ऐसा नहीं है कि पेयजल की समस्या केवल मैदानी क्षेत्र भरावन में ही बनी हुई है। तपती धूप और निरंतर नीचे गिरता सतर गोमती नदी तलहटी में बसें गांवों भटपुर, कटका, महीठा के डालखेड़ा, लालपुर खाले, जाजपुर, बेहड़ा, नई गढ़ी इत्यादि गांवों में भी पेयजल की समस्या से लोग जुझ रहे है। गोमती नदी के किनारे बसे भटपुर गांव व सड़क के चौराहे पर भी पेयजल की गम्भीर समस्या बनी हुई है। चौराहे पर इण्डिया मार्का नल की कमी हैं दूर-दूर से लोग यहां आते हैं परन्तु पीने के पानी की किल्लत से लोग परेशान होते हैं। रामप्रकाश तिवारी, केशव दीक्षित, अनूप, जयकेश, शैलेन्द्र आदि लोग पानी की समस्या के बारे में कहते हैं कि यहां चौराहे पर व गांव में कई स्थानों पर इण्डिया मार्का नलों की आवश्यकता है यहां भी जल स्तर तेजी से गिर रहा है।

जाजूपुर, बेहड़ा के लोग सियाराम राजेश गौतम, रामअवतार, राजाराम, रामकेशन, सुशीला, कुन्ती देवी, रिंकी आदि बताते हैं कि गांवों के कुएं सूख गए हैं। छोटे नलों से भी पानी उठाना भारी पड़ रहा है। नई फसल धान आदि के लिए बेढ़ लगाने हेतु सिंचाई जल की समस्या है। सियाराम, भगीरथ, हरीराम आदि के घरों के 200 मीटर के आसपास कोई इण्डिया मार्का नल न होने के कारण दूर से पानी ढोना पड़ता है। लोगों ने बताया कि कहीं-कहीं बिल्कुल पास-पास नल लगे हैं और कहीं-कहीं एक भी इण्डिया मार्का हैण्ड पंप नहीं है। जल ही जीवन है पर पीने के पानी की किल्लत ने उनका जीवन प्रभावित कर दिया है।

भरावन में 63 वर्षीय राजकिशोर त्रिपाठी जी ने बताया कि वे अभी हाल में ही अध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। 500 मीटर की परिधि तक कोई इण्डिया मार्का हैण्डपंप न होने से उन्हें सुबह 4 बजे ही उठकर पानी लाना पड़ता है। एक दिन का उनके घर परिवार व जानवरों को मिलाकर 60 बाल्टी का खर्चा है वे कहते हैं कि इस उम्र में इतना पानी ढोकर लाना बहुत ही कठिन है पर क्या करें पानी के बिना जिन्दा नहीं रहा जा सकता है। उन्होंने बताया कि पानी की चिन्ता में उन्हें ठीक से नींद भी नहीं आती है लगभग 80 परिवारों जिसमें एक हजार से ऊपर लोग रहते हैं के ब मोहल्ले में कोई इण्डिया मार्का हैण्डपंप न होने से लोग पानी के लिए तरस रहे हैं। श्री तिवारी जी ने बताया कि चुनाव के समय जब श्री रामपाल वर्मा जी उनके मुहल्ले व उनके दरवाजे वोट मांगने आए थे तो उन्होंने जोर से रामपाल वर्मा जिंदाबाद के नारे लगाए थे उन्हें वोट भी दिया हम उनके समर्थक भी हैं पर अब वे मंत्री जी हैं हम उन तक नल मांगने नहीं पहुंच पा रहे हैं मुझे नल की अति आवश्यकता है पूरे मोहल्ले के लिए विकट समस्या है उन्होंने बताया कि हमारे पीने के पानी की समस्या को दूर करने हेतु एक इण्डिया मार्का हैण्डपंप दिला दो हम आपके बहुत-बहुत जीवन भर आभारी रहेंगे

क्यों बढ़ रहा है जल-संकट


पिछले कुछ सालों में मध्य प्रदेश समेत देश भर में पानी का संकट बढ़ा है। यह समस्या प्रकृति से ज्यादा मानव-निर्मित है। वर्षा की कमी के साथ, वनों की अवैध कटाई, पुराने तालाबों पर अतिक्रमण, गाद भरने से सरोवरों की भंडारण क्षमता में कमी, पानी की फिजूलखर्ची, नदी, जलाशयों का पानी औद्योगिक इकाईयों को देने व शहरों के प्रदूषित पानी को नदियों के प्रदूषण और भूजल को बेतहाशा दोहन से समस्या बढ़ रही है। इस संकट से न केवल खेतों की सिंचाई के लिए पानी की कमी आ रही है बल्कि पीने के पानी की समस्या भी बढ़ रही है। लेकिन इससे बेखबर हम भूजल को बेतहाशा उलीचे जा रहे हैं, जिसका पुनर्भरण नहीं हो रहा है। क्योंकि अब पहले जैसी बारिश भी नहीं हो रही है और जो जंगल पानी को स्पंज की तरह सोख कर रखते थे, वो भी अब कट चुके हैं। सवाल है कि आखिर पानी गया कहां? धरती पी गई या आसमान निगल गया? पानी की सबसे बड़ी जरूरत खेती के लिए होती है। जबसे हरित क्रांति के प्यासे बीज हमारे खेतों में आए हैं, तबसे पानी का ज्यादा दोहन बढ़ा है। कहीं नहरों से तो कहीं नलकूप के माध्यम से सिंचाई की जा रही है। लेकिन पहले परंपरागत देशी बीजों से बिना सींच (सिंचाई) की विविध फसलें हुआ करती थीं। अब उनकी जगह पर केवल ज्यादा पानी वाली एकल फसलें हो रही हैं।

जैव विविधता में मिट्टी के बाद पानी एक महत्वपूर्ण संसाधन है। इसे बचाने का प्रयास सुव्यवस्थित ढंग से किया जाना चाहिए। इसके बेतहाशा दोहन और शोषण से बचा जाना चाहिए। पानी से ही समस्त प्राणी-मनुष्य, पशु-पक्षी, सूक्ष्म जीव, जीव-जंतु सभी का जीवन है। इस पानी के संकट को बारीकी से समझने के लिए हम मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले पर एक निगाह डालने की कोशिश करेंगे। यह जिला सतपुड़ा एवं विन्ध्याचल पर्वत श्रेणियों के बीच नर्मदा नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित है। इसे हम भौगोलिक रूप से दो भागों में विभक्त कर सकते हैं। एक है मैदानी क्षेत्र, जो नर्मदा का कछार कहलाता है। यहां तवा बांध की नहरों से अधिकांश सिंचाई होती है और दूसरा है जंगल पट्टी, जो सतपुड़ा की तलहटी में फैली हुई है। यह पूरी पट्टी असिंचित है। तवा कमांड की नहरों की सिंचाई से पहले यहां का फसलचक्र भिन्न था। पहले यहां मोटे अनाज- जैसे ज्वार, मक्का, कोदो, कुटकी, समा, बाजरा, देशी धान, देशी गेहूं, तुअर, तिवड़ा, चना, मसूर, मूंग, उड़द, तिल, रजगिरा, अलसी आदि कई तरह की फसलें लगाई जाती थीं। पिपरिया की तुअर दाल बहुत प्रसिद्ध हुआ करती थी। लेकिन तवा कमांड क्षेत्र में इन विविध फसलों की जगह सोयाबीन (खरीफ) और गेहू (रबी) की एकल खेती ने ले ली।

जबकि जंगल पट्टी में परंपरागत खेती की उतेरा (मिश्रित फसल) पद्धति प्रचलन में हैं। जिसमें 6-7 प्रकार के अनाज मिलाकर एक साथ बोये जाते हैं। यह बिर्रा (गेहूं- चना मिश्रित) का एक संशोधित रूप है। ये फसलें बिना सींच (सिंचाई) या कम पानी में होती है। यानी केवल बारिश के पानी से फसलें होती हैं। लेकिन हाल के कुछ बरसों से किसानों की एक बड़ी समस्या है बारिश न होना। कम बारिश या अनियमित बारिश होना। पानी का सीधा संबंध फसलों से है। पानी न मिले तो सारी खेती चैपट। बारिश पर निर्भर किसान कम बारिश के चलते परेशान हैं। उनकी आजीविका संकट में है और जो कम पानी वाली फसलें कोदो, कुटकी, तुअर, ज्वार आदि लगाते थे, उनकी समस्याएं बढ़ गई हैं। यह समस्याएं मौसम बदलाव से जुड़ी हुई हैं।

भूजल कई सालों में एकत्र होता है, यही हमारा सुरक्षित जल भंडार है। फिर बिना बिजली के उसे ऊपर खींचना मुश्किल है। पूर्व से आसन्न बिजली का संकट साल दर साल बढ़ते जा रहा है। बिजली कटौती के कारण किसान फसलों में पानी नहीं दे पा रहे हैं। अगर गेहूं की फसल में अंतिम पानी नहीं मिला तो फसल का कम उत्पादन होता है। यह अलहदा बात है कि कमजोर और छोटे किसान भारी पूंजी लगाकर सिंचाई की इस सुविधा से वंचित हैं। कुछ समय पहले तक हर गांव में तालाब हुआ करते थे। कुएं, बावड़ी, नदी-नालों में बहुतायत पानी था। वर्षा जल को छोटे-छोटे बंधानों में एकत्र किया जाता था। जिससे सिंचाई, घरेलू निस्तार और मवेशियों को पानी मिल जाता था। किसान पहले बैलों से चलने वाली मोट से खेतों की सिंचाई करते थे। लेकिन अब तालाबों पर कब्जा हो गया है। कुएं और बावड़ी जैसे परंपरागत पानी के स्रोत खत्म हो गए हैं।

आजादी के ठीक बाद पहली पंचवर्षीय योजना के तहत इस जिले में भी एक छोटा डोकरीखेड़ा बांध बनाया गया था। यद्यपि मछवासा नदी को इससे जोड़ दिया गया है लेकिन फिर भी यह बांध अपनी क्षमता के अनुसार पूरा नहीं भर पाता। उसमें गाद भर गई है, पुराव हो गया है। अब इससे केवल किसानों को मुश्किल से रबी की फसल के लिए दो पानी ही मिल पाते हैं। वह भी बारिश हुई तो, अन्यथा नहीं। इसके बाद 1975 में तवा बांध बना। इससे तवा कमांड में नहरों से सिंचाई से फायदा तो हुआ। एक समय मिट्टी बचाओ आंदोलन से जुड़ी रही ग्राम सेवा समिति के एक अध्ययन के अनुसार यहां की काली मिट्टी वाली जमीन जो काफी उपजाऊ थी, वो दलदल में तब्दील होती जा रही है। या उन जमीनों में लवणीयता और क्षारीयता बढ़ती जा रही है। नए-नए खरपतवारों का आगमन हुआ है जिससे कृषि लागत में और वृद्धि हुई तथा उत्पादन भी प्रभावित होने लगा।



 वर्ष 2003-04 में 3931, वर्ष 2004-05 में 3943, वर्ष 2005-06 में 3972 वर्ष 2006-07 में 4853 और वर्ष 2007-08 में 4894 नलकूपों का खनन हुआ। यह सिलसिला जारी है। विज्ञान और पर्यावरण केन्द्र व गांधी शांति प्रतिष्ठान की एक रिपोर्ट बताती है कि देश की भूमिगत जल संपदा प्रतिवर्ष होने वाली वर्षा से दस गुना ज्यादा है लेकिन सन् 70 से हर वर्ष करीब एक लाख 70 हजार ट्यूबवेल लगते जाने से कई इलाकों में जलस्तर घटता जा रहा है। ठीक इस जिले में भी यही हो रहा है। कुछ समय पहले तक गांव में कच्चे घर होते थे। घर के आगे पीछे काफी जगह होती थी। खेती-किसानी के काम में घरों में ज्यादा जगह लगती है। घर के आगे आंगन और घर के पीछे बाड़ी होती थी। बाड़ी में हरी सब्जियां लगाई जाती थीं। पेड़-पौधे लगे होते थे। इस सबसे बारिश का पानी नीचे जज्ब होता था और धरती का पेट भरता था। यानी भूजल ऊपर आता था। आज गांव में भी पक्के मकान बन गए हैं। घरों के पीछे बाड़ी भी नहीं है। 

इसलिए बारिश का पानी बेकार बह जाता है। इस कारण न तो उसे हम निस्तार के उपयोग में ला पा रहे हैं और न वह पानी धरती में समा रहा है। यानी हम धरती से पानी ले तो रहे हैं, लेकिन उसे दे नहीं रहे हैं। इस कारण भूजल का पुनर्भरण नहीं हो रहा है। नतीजतन, टाइम बम की तरह हर साल भूजल नीचे चला जा रहा है। पानी का एकमात्र स्रोत है वर्षा। जिला गजेटियर 1979 के अनुसार जिले की सामान्य वर्षा 1294.5 मि.मी. है। पर जो वर्षा होती है उसकी अवधि सीमित है। मानसून के 3-4 माह। जिसका करीब आधा प्रतिशत पानी वाष्पीकृत होकर उड़ जाता है और बाकी बचे आधे पानी में से खेतों की सिंचाई, भूजल का पुनर्भरण और नदी-नालों का पेट भरता है। अब हमें इसी पानी को सहेजना होगा। खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में रोकना होगा। बारिश का पानी तालाब या छोटे बंधानों के माध्यम से गांव में ही रोका जा सकता है।

यह कैसे होगा? यह सरल तरीका है। जैसे भी हो, जहां भी संभव हो, बारिश के पानी को वहीं रोककर कमजोर वर्ग के लोगों के खेत तक पहुंचाना चाहिए। जहां पानी गिरता है, उसे सरपट न बह जाने दें। स्पीड ब्रेकर जैसी पार बांधकर, उसकी चाल को कम करके धीमी गति से जाने दें। इसके कुछ तरीके हो सकते हैं। खेत का पानी खेत में रहे इसके लिए मेढ़बंदी की जा सकती है। गांव का पानी गांव में रहे इसके लिए तालाब और छोटे बंधान बनाए जा सकते हैं। चेकडैम बनाए जा सकते हैं। या जो टूट-फूट गए हैं उनकी मरम्मत की जा सकती है। वृक्षारोपण किया जा सकता है। शहरों में वॉटर हार्वेस्टिंग के माध्यम से पानी को एकत्र कर भूजल को ऊपर लाया जा सकता है। इसके माध्यम से कुओं व नलकूप को पुनजीर्वित किया जा सकता है। नदी-नालों में बोरी-बंधान बनाए जा सकते हैं। सूखी नदियों को गहरा किया जा सकता है। 

इसके साथ सबसे जरूरी है खेती में हमें फसलचक्र बदलना होगा। कम पानी या बिना सींच के परंपरागत देशी बीजों की खेती करनी होगी और ऐसी कई देशी बीजों को लोग भूले नहीं है, वे कुछ समय पहले तक इन्हीं बीजों से खेती कर रहे थे। देशी बीज और हल-बैल, गोबर खाद की ओर मुड़कर मिट्टी-पानी का संरक्षण करना होगा। यानी समन्वित प्रयास से ही हम पानी जैसे बहुमूल्य संसाधन का संरक्षण व संवर्धन कर सकते हैं। इस संदर्भ में हमें महात्मा गांधी की सीख याद रखनी चाहिए, उन्होंने कहा था कि प्रकृति मनुष्य की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती है, परंतु लालच की नहीं। 

यह रिपोर्ट इंक्लूसिव मीडिया फैलोशिप के अध्ययन का हिस्सा है

नदियों का बढ़ता निरादर


इसे अपनी संस्कृति की विशेषता कहें या परंपरा, हमारे यहां मेले नदियों के तट पर, उनके संगम पर या धर्म स्थानों पर लगते हैं और जहां तक कुंभ का सवाल है, वह तो नदियों के तट पर ही लगते हैं। आस्था के वशीभूत लाखों-करोड़ों लोग आकर उन नदियों में स्नान कर पुण्य अर्जित कर खुद को धन्य समझते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वे उस नदी के जीवन के बारे में कभी भी नहीं सोचते। देश की नदियों के बारे में केंद्रीय प्रदूषण नियत्रंण बोर्ड ने जो पिछले दिनों खुलासा किया है, वह उन संस्कारवान, आस्थावान और संस्कृति के प्रतिनिधि उन भारतीयों के लिए शर्म की बात है, जो नदियों को मां मानते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने अध्ययन में कहा है कि देशभर के 900 से अधिक शहरों और कस्बों का 70 फीसदी गंदा पानी पेयजल की प्रमुख स्रोत नदियों में बिना शोधन के ही छोड़ दिया जाता है।

वर्ष 2008 तक के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, ये शहर और कस्बे 38,254 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) गंदा पानी छोड़ते हैं, जबकि ऎसे पानी के शोधन की क्षमता महज 11,787 एमएलडी ही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कथन बिलकुल सही है। नदियों को प्रदूषित करने में दिनों दिन बढ़ते उद्योगों ने भी प्रमुख भूमिका निभाई है। इसमें दो राय नहीं है कि देश के सामने आज नदियों के अस्तित्व का संकट मुंह बाए खड़ा है। कारण आज देश की 70 फीसदी नदियां प्रदूषित हैं और मरने के कगार पर हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेड़ी, साबरमती और खारी, हरियाणा की मारकंडा, उत्तर प्रदेश की काली और हिंडन, आंध्र की मुंसी, दिल्ली में यमुना और महाराष्ट्र की भीमा नदियां सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। यह उस देश में हो रहा है, जहां आदिकाल से नदियां मानव के लिए जीवनदायिनी रही हैं। 

उनकी देवी की तरह पूजा की जाती है और उन्हें यथासंभव शुद्ध रखने की मान्यता व परंपरा है। समाज में इनके प्रति सदैव सम्मान का भाव रहा है। एक संस्कारवान भारतीय के मन-मानस में नदी मां के समान है। उस स्थिति में मां से स्नेह पाने की आशा और देना संतान का परम कर्तव्य हो जाता है। फिर नदी मात्र एक जलस्त्रोत नहीं, वह तो आस्था की केंद्र भी है। विश्व की महान संस्कृतियों-सभ्यताओं का जन्म भी न केवल नदियों के किनारे हुआ, बल्कि वे वहां पनपी भी हैं। 

वेदकाल के हमारे ऋषियों ने पर्यावरण संतुलन के सूत्रों के दृष्टिगत नदियों, पहाड़ों, जंगलों व पशु-पक्षियों सहित पूरे संसार की और देखने की सहअस्तित्व की विशिष्ट अवधारणा को विकसित किया है। उन्होंने पाषाण में भी जीवन देखने का जो मंत्र दिया, उसके कारण देश में प्रकृति को समझने व उससे व्यवहार करने की परंपराएं जन्मीं। यह भी सच है कि कुछेक दशक पहले तक उनका पालन भी हुआ, लेकिन पिछले 40-50 बरसों में अनियंत्रित विकास और औद्योगीकरण के कारण प्रकृति के तरल स्नेह को संसाधन के रूप में देखा जाने लगा, श्रद्धा-भावना का लोप हुआ और उपभोग की वृत्ति बढ़ती चली गई। चूंकि नदी से जंगल, पहाड़, किनारे, वन्य जीव, पक्षी और जन जीवन गहरे तक जुड़े हैं, इसलिए जब नदी पर संकट आया, तब उससे जुड़े सभी सजीव-निर्जीव प्रभावित हुए बिना न रहे और उनके अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा। असल में जैसे-जैसे सभ्यता का विस्तार हुआ, प्रदूषण ने नदियों के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया। 

लिहाजा, कहीं नदियां गर्मी का मौसम आते-आते दम तोड़ देती हैं, कहीं सूख जाती हैं, कहीं वह नाले का रूप धारण कर लेती हैं और यदि कहीं उनमें जल रहता भी है तो वह इतनी प्रदूषित हैं कि वह पीने लायक भी नहीं रहता है। देखा जाए तो प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने में भी हमने कोताही नहीं बरती। वह चाहे नदी जल हो या भूजल, जंगल हो या पहाड़, सभी का दोहन करने में कीर्तिमान बनाया है। हमने दोहन तो भरपूर किया, उनसे लिया तो बेहिसाब, लेकिन यह भूल गए कि कुछ वापस देने का दायित्व हमारा भी है। नदियों से लेते समय यह भूल गए कि यदि जिस दिन इन्होंने देना बंद कर दिया, उस दिन क्या होगा? आज देश की सभी नदियां वह चाहे गंगा, यमुना, नर्मदा, ताप्ती हो, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी हो, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, रावी, व्यास, झेलम या चिनाब हो या फिर कोई अन्य या इनकी सहायक नदियां। ये हैं तो पुण्य सलिला, लेकिन इनमें से एक भी ऎसी नहीं है, जो प्रदूषित न हो। 

असल में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का खामियाजा सबसे ज्यादा नदियों को ही भुगतना पड़ा है। सर्वाधिक पूज्य धार्मिक नदियों गंगा-यमुना को लें, उनको हमने इस सीमा तक प्रदूषित कर डाला है कि दोनों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अब तक करीब 15 अरब रूपये खर्च किए जा चुके हैं, फिर भी उनकी हालत 20 साल पहले से ज्यादा बदतर है। मोक्षदायिनी राष्ट्रीय नदी गंगा को मानवीय स्वार्थ ने इतना प्रदूषित कर डाला है कि कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और पटना सहित कई एक जगहों पर गंगाजल आचमन लायक भी नहीं रहा है। यदि धार्मिक भावना के वशीभूत उसमें डुबकी लगा ली तो त्वचा रोग के शिकार हुए बिना नहीं रहेंगे।कानपुर से आगे का जल पित्ताशय के कैंसर और आंत्रशोध जैसी भयंकर बीमारियों का सबब बन गया है। यही नहीं, कभी खराब न होने वाला गंगाजल का खास लक्षण-गुण भी अब खत्म होता जा रहा है। गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रो. बी.डी. जोशी के निर्देशन में हुए शोध से यह प्रमाणित हो गया है। 

दिल्ली के 56 फीसदी लोगों की जीवनदायिनी, उनकी प्यास बुझाने वाली यमुना आज खुद अपने ही जीवन के लिए जूझ रही है। जिन्हें वह जीवन दे रही है, अपनी गंदगी, मलमूत्र, उद्योगों का कचरा, तमाम जहरीला रसायन व धार्मिक अनुष्ठान के कचरे का तोहफा देकर वही उसका जीवन लेने पर तुले हैं। असल में अपने 1376 किमी लंबे रास्ते में मिलने वाली कुल गंदगी का अकेले दो फीसदी यानी 22 किमी के रास्ते में मिलने वाली 79 फीसदी दिल्ली की गंदगी ही यमुना को जहरीला बनाने के लिए काफी है। यमुना की सफाई को लेकर भी कई परियोजनाएं बन चुकी हैं और यमुना को टेम्स बनाने का नारा भी लगाया जा रहा है, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात रहे हैं। देश की प्रदूषित हो चुकी नदियों को साफ करने का अभियान पिछले लगभग 20 साल से चल रहा है। 

इसकी शुरूआत राजीव गांधी की पहल पर गंगा सफाई अभियान से हुई थी। अरबों रूपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन असलियत है कि अब भी शहरों और कस्बों का 70 फीसदी गंदा पानी बिना शोधित किए हुए ही इन नदियों में गिराया जा रहा है। नर्मदा को लें, अमरकंटक से शुरू होकर विंध्य और सतपुड़ा की पहाडियों से गुजरकर अरब सागर में मिलने तक कुल 1,289 किलोमीटर की यात्रा में इसका अथाह दोहन हुआ है। 1980 के बाद शुरू हुई इसकी बदहाली के गंभीर परिणाम सामने आए। यही दुर्दशा बैतूल जिले के मुलताई से निकलकर सूरत तक जाने वाली और आखिर में अरब सागर में मिलने वाली सूर्य पुत्री ताप्ती की हुई, जो आज दम तोड़ने के कगार पर है। तमसा नदी बहुत पहले विलुप्त हो गई थी। बेतवा की कई सहायक नदियों की छोटी-बड़ी जल धाराएं भी सूख गई हैं। 

आज नदियां मलमूत्र विसर्जन का माध्यम बनकर रह गई हैं। ग्लोबल वार्मिग का खतरा बढ़ रहा है और नदी क्षेत्र पर अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है और जल संकट और गहराएगा ही। ऎसी स्थिति में हमारे नीति-नियंता नदियों के पुनर्जीवन की उचित रणनीति क्यों नहीं बना सके, जल के बड़े पैमाने पर दोहन के बावजूद उसके रिचार्ज की व्यवस्था क्यों नहीं कर सके, वर्षा के पानी को बेकार बह जाने देने से क्यों नहीं रोक पाए और अतिवृष्टि के बावजूद जल संकट क्यों बना रहता है, यह समझ से परे है। वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल संकट दूर करने के शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए गए तो बहुत देर हो जाएगी और मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।