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शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

कानून से होता अन्याय



राजस्थान में वन अधिकार कानून की मनमानी व्याख्या कर अधिकारियों द्वारा आदिवासियों को भूमिहीन बनाने का सिलसिला निरंतर जारी है। विगत दिनों जयपुर में हुई जनसुनवाई में सरकारी अधिकारियों तक ने इस विसंगति को स्वीकार किया है। देखना है कि क्या भविष्य में स्थितियों में सुधार होगा

देश में आदिवासियों में उमड़ते असंतोष पर हाल के समय में चिंता तो बहुत व्यक्त की गई है, पर इस असंतोष के सबसे बड़े कारण को दूर करने के असरदार उपाय अभी तक नहीं उठाए गए हैं। इस असंतोष का प्रमुख कारण है आदिवासियों की जमीन का उनसे निरंतर छिनते जाना। यह एक ऐतिहासिक प्रक्रिया रही है, जो आज तक न केवल जारी है अपितु समय के साथ और भी जोर पकड़ रही है। आदिवासी वन भूमि हकदारी कानून 2006 के अंतर्गत ऐतिहासिक अन्याय दूर करने का प्रयास किया गया है, परंतु इस कानून का क्रियान्वयन भी ठीक तरह से नहीं हुआ। बहुत से सही दावे खारिज कर दिए गए व इस बारे में आदिवासियों या परंपरागत वनवासियों को निर्णय की सूचना तक नहीं दी गई। आदिवासियों के भूमि-अधिकारों के हनन पर ऐसे अनेक महत्वपूर्ण तथ्य 21 मार्च को राजस्थान की राजधानी जयपुर में आयोजित एक जन-सुनवाई में सामने आए। इस जन-सुनवाई का आयोजन राजस्थान आदिवासी अधिकार संगठन व जंगल जमीन जन आंदोलन ने किया था। अनेक भुक्तभोगी आदिवासियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बहुत से उदाहरण देते हुए यह स्पष्ट किया कि कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए आदिवासियों की जमीन बड़े पैमाने पर कैसे छिनी व वे अनेक स्थानों पर अपने ही घर में कैसे बेघर बनाए गए।

उदयपुर व सिरोही जिले में बने एक राजमार्ग में 1816 खातेदारों की जमीनें गई, जिनमें से 1473 आदिवासी हैं। इनमें से अनेक को आश्चर्यजनक हद तक कम मुआवजा दिया गया। लगभग 320 आदिवासी परिवारों को 1000 रुपए से कम मुआवजा मिला व 668 परिवारों को 5000 रुपए से कम मुआवजा मिला। रताराम गरासिया जैसे व्यक्तियों ने बहुत कम मुआवजा लेने से इंकार किया तो उन्हें अब तक मुआवजा ही नहीं मिला। माही व कदना जैसे अनेक बांधों से विस्थापित हुए हजारों परिवार आज तक दर-दर भटक रहे हैं। उनकी क्षति पूर्ति बहुत ही कम की गई। उन्हें 1000 रुपए प्रति बीघे से भी कम का मुआवजा दिया गया तथा ऐसे स्थानों पर बसने को मजबूर किया गया जहां खेती व आवास की स्थिति कानूनी तौर पर पूरी तरह सुरक्षित नहीं थी। वन-अधिकार कानून बनने पर उनके मामलों पर विशेष सहानुभूति से विचार करना जरूरी था लेकिन उन्हें आज तक न्याय नहीं मिला है। ऐसे अनेक परिवारों को ऐसी जगह बसने को कहा गया जहां पहले से आदिवासी रह रहे थे। इस तरह आदिवासियों में आपसी झगड़े की स्थिति उत्पन्न कर दी गई।

शहरीकरण के साथ विभिन्न शहरों के आस-पास की मंहगी होती आदिवासियों की जमीन पर भू-माफिया अपना कब्जा जमा रहे हैं। प्रतापगढ़ जैसे अनेक शहरों में आस-पास के अनेक किलोमीटर के इलाकों में यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। उद्योगों व बिजलीघरों के नाम पर भी आदिवासियों से जमीनें बहुत सस्ते में ली गई हैं। इसमें से जिस जमीन पर उद्योग नहीं लगे वह भी आदिवासियों को लौटाई तक नहीं गई। प्रायः विभिन्न परियोजनाओं के लिए जितनी जमीन की जरूरत होती है, उससे ज्यादा जमीन ले ली जाती है। बढ़ते खनन से भी आदिवासी बुरी तरह प्रभावित हैं। कई मामले ऐसे भी हैं, जहां सरकारी जरूरत बता कर जमीन ली गई पर बाद में इसे निजी कंपनी को बेच दिया गया।

यह एक क्रूर विडंबना है कि कानून में आदिवासियों के भूमि-अधिकारों की रक्षा की व्यवस्था के बावजूद आदिवासियों के हाथों से निरंतर भूमि छिनती जाए। यदि अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों के लिए बने वर्ष 1996 के विशेष पंचायत कानून (जिसे संक्षेप में पेसा कानून कहा जाता है) का ठीक से क्रियान्वयन होता तो इससे भी आदिवासी भूमि अधिकारों को बचाने में मदद मिल सकती थी। पर इस कानून का पालन राजस्थान सहित किसी भी राज्य में नहीं हो रहा है। इस कानून के नियम राज्य में बहुत देरी से वर्ष 2011 में तैयार किए गए व ये नियम भी कानून की मूल भावना के अनुरूप नहीं हैं।


जिस कानून से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं, उससे यदि किसी की क्षति होती है व उसकी भूमि पहले से कम होती है तो इससे असंतोष और फैलेगा। कार्यकर्ताओं व गांववासियों के साथ जन-सुनवाई में मौजूद अधिकारियों ने भी कहा कि इस कानून के क्रियान्वयन में तुरंत सुधार होने चाहिए इसके साथ आदिवासियों की भूमि की रक्षा के लिए अन्य असरदार कदम उठाए जाने की जरूरत पर भी सहमति बनी।

इस तरह से वायदे कई बार किए गए कि वन्य जीव संरक्षण कानून में सुधार कर इस कानून के अंतर्गत होने वाले विस्थापन को न्यूनतम किया जाएगा। पर जन-सुनवाई में कार्यकर्ताओं व गांववासियों ने बताया कि कुंभलगढ़ राष्ट्रीय पार्क जैसी परियोजनाओं के कारण आदिवासियों व अन्य गांववासियों के सामने बड़े पैमाने पर विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है। इस राष्ट्रीय पार्क के क्षेत्र में राजसमंद, उदयपुर व पाली जिले के 128 गांव आते हैं। जहां एक ओर कई परियोजनाओं से जमीन छिन रही है, वहां भूमिहीन परिवारों में भूमि-वितरण का कार्य बहुत कमजोर है। भूमि के कागज देना भर पर्याप्त नहीं है, जरूरत तो इस बात की है कि वास्तव में भूमि पर कब्जा मिले व जिन्हें भूमि आबंटित हुई है वे वास्तव में इस भूमि को जोत सकें।

वन अधिकार कानून 2006 से आदिवासियों व अन्य परंपरागत वनवासियों को बड़ी उम्मीदें थीं पर इस जन-सुनवाई में राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों के जो आंकड़े प्रस्तुत किए गए, उससे पता चलता है कि बड़े पैमाने पर दावे खारिज हुए हैं। जो दावे स्वीकृत हुए हैं, उनमें से अधिकांश को आंशिक स्वीकृति ही मिली है। उदाहरण के लिए कोई आदिवासी चार बीघा जमीन जोत रहा था व उसे एक बीघे की स्वीकृति मिल गई तो नई कानूनी व्यवस्था के अनुसार उसे तीन बीघा जमीन छोड़ना पड़ेगा। ऐसे अनेक मामलों की पैरवी करने वाले अधिवक्ता व कार्यकर्ता रमेश नंदवाना ने बताया कि ऐसे मामले जिनमें पूरी स्वीकृति मिली है के मात्र 10 प्रतिशत ही होने की संभावना है।

इसके अतिरिक्त सामूहिक भूमि के अधिकांश दावे अस्वीकृत हुए हैं। अन्य परंपरागत वनवासियों (जो आदिवासी के रूप में स्वीकृत नहीं हैं) के अधिकांश दावों को अस्वीकृत कर दिया गया है। इतना ही नहीं, जिन परिवारों के दावे खारिज हुए हैं उन्हें सामान्यतः इसकी जानकारी भी नहीं दी जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि वे समय पर अपील भी नहीं कर पाते हैं। जिस कानून से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं, उससे यदि किसी की क्षति होती है व उसकी भूमि पहले से कम होती है तो इससे असंतोष और फैलेगा। कार्यकर्ताओं व गांववासियों के साथ जन-सुनवाई में मौजूद अधिकारियों ने भी कहा कि इस कानून के क्रियान्वयन में तुरंत सुधार होने चाहिए 

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

आखिर क्यों उफन जाती हैं नदियां

मई-जून के महीनों में जब तीन-चौथाई देश पानी के लिए त्राहि -त्राहि कर रहा था, पूर्वोत्तर राज्यों में भी बाढ़ से तबाही का दौर शुरू हो चुका था। अभी बारिश के असली महीने सावन की शुरुआत है और लगभग आधा हरियाणा, पंजाब का बड़ा हिस्सा, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार का बड़ा हिस्सा नदियों के रौद्र रूप से पानी-पानी हो गया है।


हर बार ज्यों-ज्यों मानसून अपना रंग दिखाता है, वैसे ही देश के बड़े भाग में नदियां उफन कर तबाही मचाने लगती हैं। पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पायेंगे कि बारिश की मात्र भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफनने लगी हैं और मौसम बीतते ही, उन इलाकों में एक बार फिर पानी का संकट छा जाता है। सूखे और मरुस्थल के लिए कुख्यात राजस्थान भी नदियों के गुस्से से अछूता नहीं रह पाता है।

देश के कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का 16 फीसदी बिहार में है। यहां कोसी, गंडक, बूढ़ी गंडक, बाधमती, कमला, महानंदा, गंगा आदि नदियां तबाही लाती हैं। इन नदियों पर तटबंध बनाने का काम केन्द्र सरकार से पर्याप्त सहायता नहीं मिलने के कारण अधूरा है। यहां बाढ़ का मुख्य कारण नेपाल में हिमालय से निकलने वाली नदियां हैं। ‘बिहार का शोक’ कहे जाने वाली कोसी के ऊपरी भाग पर कोई 70 किलोमीटर लंबाई का तटबंध नेपाल में है, लेकिन इसके रखरखाव और सुरक्षा पर सालाना खर्च होने वाला कोई 20 करोड़ रुपया बिहार सरकार को झेलना पड़ता है।

हालांकि तटबंध भी बाढ़ से निबटने में सफल रहे नहीं हैं। कोसी के तटबंधों के कारण उसके तट पर बसे 400 गांव डूब में आ गए हैं। कोसी की सहयोगी कमला-बलान नदी के तटबंध का तल सिल्ट (गाद) के भराव से ऊंचा हो जाने के कारण बाढ़ की तबाही अब पहले से भी अधिक होती है। फरक्का बराज की दोषपूर्ण संरचना के कारण भागलपुर, नौगछिया, कटिहार, मुंगेर, पूर्णिया, सहरसा आदि में बाढ़ग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है।

बगैर सोचे समझे नदी-नालों पर बंधान बनाने के कुप्रभावों का ताजातरीन उदाहरण मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बहने वाली छोटी नदी ‘केन’ है। केन के अचानक रौद्र हो जाने के कारणों को खोजा तो पता चला कि यह सब तो छोटे-बड़े बांधों की कारिस्तानी है। सनद रहे केन नदी, बांदा जिले में चिल्ला घाट के पास यमुना में मिलती है। केन में बारिश का पानी बढ़ता है, फिर ‘स्टाप-डेमों’ के टूटने का जल-दबाव बढ़ता है। केन क्षमता से अधिक पानी ले कर यमुना की ओर लपलपाती है। वहां का जल स्तर इतना ऊंचा होता है कि केन के प्राकृतिक मिलन स्थल का स्तर नीचे रह जाता है। रौद्र यमुना, केन की जलनिधि को पीछे धकेलती है। इसी कशमकश में नदियों की सीमाएं गांवों-सड़कों-खेतों तक पहुंच जाती हैं।

वैसे शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन ऐसे प्रमुख कारण हैं, जो बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे हैं। जब प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कर कंक्रीट का जंगल सजाया जाता है तो जमीन की जल सोखने की क्षमता तो कम होती ही है, साथ ही सतही जल की बहाव क्षमता भी कई गुना बढ़ जाती है। फिर शहरीकरण के कूड़े ने समस्या को बढ़ाया है। यह कूड़ा नालों से होते हुए नदियों में पहुंचता है। फलस्वरूप नदी की जल ग्रहण क्षमता कम होती है। पंजाब और हरियाणा में बाढ़ का कारण जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में हो रहा जमीन का अनियंत्रित शहरीकरण ही है। इससे वहां भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और इसका मलबा भी नदियों में ही जाता है। पहाड़ों पर खनन से दोहरा नुकसान है। इससे वहां की हरियाली उजड़ती है और फिर खदानों से निकली धूल और मलबा नदी-नालों में अवरोध पैदा करता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों के मामले में तो मामला और भी गंभीर हो जाता है।

मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों की त्रासदी है। कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के ऊंचाई-स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी, नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जो कि बाढ़ सरीखी भीषण विभीषिका का मुंहतोड़ जवाब हो सकते हैं।

रविवार, 24 अप्रैल 2011

जल संरक्षण के लिए धन से ज्‍यादा धुन की जरूरत





बारहमासी हो चुकी जल की समस्‍या गर्मियों में चरम पर होती है। शहरों के गरीब और मध्‍यमवर्गीय तबके में बूंद-बूंद के लिए हाहाकर मचा रहता है। बिडंबना तो यह है कि इस विकराल समस्‍या को गंभीरता से नहीं लिया जाता हैं। सरकारों के  साथ आम जन में भी जल संरक्षण के प्रति संजीदगी  दिखाई नहीं देती है। शायद लोगों को लगता है कि उनके प्रयास से कुछ नहीं होने वाला है।जमीन पर लगातार क्रंकीट की चादर बिछाई जा रही है, जिसके कारण भूमि में पानी के रिसाव पर पहरा लग लग गया है। प्रकृति के अत्‍यधिक दोहन से धरती का गर्भ सूखता ही जा रहा है।
बारिश से पहले पाल बांधने वाला समाज आज बांधों के भंवर में फंस गया है। यहीं कारण हैं कि सूखे को झेलने वाला राजस्‍थान का बाड़मेर बाढ़ के थपेड़ों को सहने को मजबूर है। बिहार को तारने वाले यह बांध अब उसको की डूबाने लगे हैं। अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में आने वाली इन प्राकतिक समस्‍याओं का इलाज है। पहले सामुदियक जल प्रबंधन के तहत लोग बारशि की बूदों को सहजने के लिए अपने घर की छत के जल को नीचे एक कुंड में साफ-सुथरे तरीके से एकत्र करते थे।बरसात का पानी खेत की फसल की जरुरत को पूरा करने के साथ अन्‍य क्षेत्रों के जल के साथ पास के तालाब में इकट़ठा होता था। बाद में इस जल से खेती और घरेलू जल की जरुरतें पूरी की जाती थी रेगिस्‍तानी भूमि में करीब पांच छह फूट नीचे चूने की परत बरसाती पानी को रोके रहती थी बाद में इसका उपयोग पीने व अन्‍य कामों के लिए किया जाता था इस तरह सूखे की मार में यह पाल-ताल समाज को बचाकर रखते थे। अब हम इस तरह सामुदायिक जल प्रबंधन को भूलकर राज्‍य या भारत सरकार के बनाए बांधों की ओर देखने लगे हैं। ये बांध जहां नदियों को बांधकर उनकी हत्‍या करते हैं वहीं, दूसरी ओर बाढ़ लाकर कहर बरपाते हैं।
बांध बनने से सामान्‍य बर्षों में जनता को लाभ मिलता हैलेकिन, बाढ़ आने पर पानी बांध को तोड़कर एकाएक फैलता है। कभी-कभी इसका प्रकोप इतना भयंकर होता है कि चंद घंटों में दस-बारह फूट तक बढ़ जाता है और जनजीवन को तबाह करके रख देता है। बांध बनने से सिल्‍ट फैलने की बजाए बांधों के बीच जमा हो जाती हैइससे बांध का क्षेत्र ऊपर उठ जाता है जब बांध टूटता है तो यह पानी वैसे ही तेजी से फैलता है जैसे मिट़टी का घड़ा फूटने पर बांधों से पानी के निकास के रास्‍ते अवरूद्ध हो जाते हैं। दो नदियों पर बनाए बांधों के बीच पचास से सौ किलोमीटर का एरिया कटोरानुमा हो जाता है। बांध टूटने पर पानी इस कटोरेनुमा क्षेत्र में एकट़ठा हो और इसका निकलना मुश्किल हो जाता है इससे बाढ़ का प्रकोप शांत होने में काफी समय लगता है।
इन समस्‍याओं के चलते बांध बनने से परेशानियां बढ़ी हैं। जाहिर है कि बांध बनाने की वर्तमान पद्धति कारगर नहीं है।सामुदायिक जल प्रबंधन होने से पाल-ताल  बनने बंद हो गए हैं, जिससे हमें साल बाढ़ विभिषका से दो-चार होना पड़ रहा है।
सरकार को चाहिए कि अंधाधुंध बांध बनाने की वर्तमान नीति पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। पहले विकल्‍प में नदियों के पर्यावरणीय प्रवाह को बररार रखा जाना चाहिए दूसरा विकल्‍प उंचे और स्‍थायी बांध बनाने की वर्तमान नीति का है  तीसरा विकल्‍प प्रकृतिप्रस्‍त बाढ़ के साथ जीने के लिए लोगों  को सुविधा मुहैया कराने का है इसमें फ्लड रूफिंग के लिए ऊंचे सुरक्षित स्‍थानों का निर्माण, सुरक्षित संचार एवं पीने के पानी की इत्‍यादि की व्‍यवस्‍था शामिल है,‍ जिससे बाढ़ के साथ जीवित रह सके। धरती के ऊपर बड़े बांधों से अति गतिशील बाढ़ का प्रकोप बढ़ने लगा है। इसे रोकने के लिए जल का अविरल प्रवाह को बनाए रखना होगा। इस काम से ही जल के सभी भंड़ारों को भरा रखा जा सकता है चूंकि, बाढ़ और सूखा एक ही सिक्‍के के दो पहलू हैं।इसलिए इन दानों के समाधान जल का सामुदायिक जल प्रबंधन ताल-पाल और झाल से ही संभव है।

कैद हैं नदियां 
15 अगस्‍त 1947 को मिली आजादी में राष्‍टपिता महात्‍मा गांधी ने जिस आजाद भारत की परिकल्‍पना की थी उसमें प्रकृति को कैद करने की ख्‍वाहिश नहीं  थी।  गांधी के सपने में एक ऐसे भारत की परिकल्‍पना थी जो देश की प्रकृति ओर उसके साथ जीने वाले ग्रामीण को उसका स्‍वराज ओर सुराज दानों दिलाएगा। एक ऐसा भारत जहां समाज और प्रकृति को अपनी जरुरत की पूर्ति क
रने वाले उपहार के तौर पर देखेगा, न कि लालच की पूर्ति करने वाले खजाने के तौर पर। लेकिन, पिछले 64 वर्षों के आजाद भारत के सफरनामे में ऐसा नहीं हुआ। जिस देश में नदियों को कैद करने के लिए दिन- प्रतिदिन एक नई कोशिश चल रही है ऐसे में 15 अगस्‍त के दिन स्‍वतंत्रता अदायगी से ज्‍यादा कुछ नहीं है।
यादि भारत की आजादी को गौरवशाली बनाकर रखना है तो हमें अपनी नदियों के प्रवाह को शुद्ध-सदानीरा, नैसर्गिक और आजाद बनाना होगा। नदियों की आजादी का रास्‍ता नदीं तट पर फैली उसकी बाजुओं की हरियाली में छुपा है भारत की आजदी, बाघ और जानवरों की आजदी रखने वाले जंगलों बचाने और नदियों के स्‍वच्‍छंद बहाव से ही कायम रहेगी।नदियों के किनारे सघन और स्‍थानीय जैव विविधता का सम्‍मान करने वाली हरित पटि़टयों का विकास से संभव है। लेकिन, यह तभी संभव हो सकता है जब नदियों की भूमि अतिक्रमण और प्रदूषण से मुक्‍त हो नदी भूमि का हस्‍तानान्‍तरण और रूपांतरण रुके।
उत्‍तराखंड में भागीरथी पर बांध, दिल्‍ली में यमुना में खेलगांव-मेटो आदि का निर्माण, उत्‍तर प्रदेश में गंगा एक्‍सप्रेस वे नाम का तटबंध, बिहार और बंगाल में क्रमशः पहले से ही बंधी कोसी और हुगली जैसी नदियों को कैद करने का काम ही है। नदी और भूमि की मुक्ति के लिए पिछले कई वर्षों से संधर्ष जारी है लेकिन सरकारें हैं कि बिना सोचे विचारे अपनी जिदपर अड़ी हुर्इ हैं।

समस्‍या के हल के लिए धन से ज्‍यादा धुन की जरूरत 
पानी मुददा है यह सच है। लेकिन, इससे भी बड़ा मुद्दा है, हमारी आंखों का पानी। क्‍योंकि, पानी चाहे धरती के ऊपर को हो या धरती के नीचे का यह सूखता तभी है जब संत, समाज और सरकार तीनों की आंखों का पानी मर जाता है। आज ऐसा ही है वरना पानी के मामले में  हम कभी गरीब नहीं रहे।
आज भी हमारे ताल-तलैये झीलों और नदीयों को सम्रद्ध रखने वाली वर्षा के सालाना औसत में बहुत कमी नहीं आई है। जल संरक्षण के नाम पर धन राशि कोई कम खर्च नहीं हुई। जल संरक्षण को लेकर अच्‍छे कानून और शानदार अदालती आदेशों की भी एक नहीं अनेक मिसाल हैं। वर्षा जल के संचय की तकनीक और उपयोग में अनुशासन की जीवन शैली तेा हमारे गांव का कोई गंवार भी आपको सिखा सकता है। लेकिन, ये हमारी आंखों का पानी नहीं ले जा सकते।
भारतीय संस्‍कृति में समाज को प्रकृति अनुकूल अनुशासित जीवनशैली हेतु निर्देशित व प्रेरित करने का दायित्‍व धर्मगुरूओं का था। तद्नुसार समाज पानी के काम को धर्मार्थ का आवश्‍यक व साझा काम मानकर किया करता था। इसके लिए महाजन धन शासक भूमि व संरक्षण प्रदान करता था। आज सभी अपने-अपने दायित्‍व से विमुख हो गए है। स्‍वंय धर्मगुरूओं के आश्रमों का कचरा नदियों  में जाता हैं समाज सोच रहा है हम सरकार को वोट ओर नोट देते हैं अतः सबकुछ सरकार करेगी। सरकारें हैं कि इनमें पानी के प्रति प्रतिबद्धता कहीं दिखाई नहीं दे रही। सरकारी योजनाओं के पैसे से बेईमान अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। वरना एक अकेले मनरेगा के कार्य ही देश के तालाबों का उद्धार कर देते।

 इतिहास के झरोखे सेः जल संरक्षण के पारंपरिक तरीके आज भी उतने ही कारगर 
 सैकड़ों, हजारों तालाब अचानक शून्‍य से प्रकट नही हुए थे। इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की  तो दहाई थी बनाने वालों की यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ों हजार बनती थी। पिछले दो सौ बरसों में नए किस्‍म की थोड़ी सी पढ़ाई पढ़ गए समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार को शून्‍य ही बना दिया है। इस नए समाज में इतनी उत्‍सुकता ही नई बची कि इससे पहले के दौर में इतने सारे तालाब कौन बनाता थाउसने इस तरह के काम को करने के लिए जो ढ़ाचा खड़ा किया था। आइआइटी का, सिविल इंजीनियरिंग का, उस पैमाने से, उस गंज से भी उसने पहले हो चुके इस काम को नापने की कोई कोशिश नहीं की।
वह अपने गज से भी नापता है तो कम से कम उसके मन में ऐसे सवाल तो उठते कि उस दौर में  कहां थी? आइआइटी? कौन थे उसके निर्देशक? कितना बजट था? कितने सिविल इंजीनियर निकलते थे? लेकिन, उसने इन सब को गए जमाने का गया-बीता काम माना और पानी के प्रश्‍न को नए ढ़ग से हल करने का वादा भी कियाऔर दावा भी। गांवों कस्‍बों की तो कौन कहे, बड़े शहरों के नलों में चाहे जब बहने वाला सन्‍नाटा इस वायदे और दावे पर सबसे मुखर टिप्‍पणी है इस समय के समाज के दावों को इसी समय के गज से नापें तो कभी दावे छोटे पड़ते हैं तो कभी गज ही छोटा निकल आता है।

एकदम महाभारत और रामायण के तालाबों को अभी छोड़ दें तो भी कहा जा सकता है कि कोई पांचवी सदी से पंद्रहवी सदी तक देश के इन कोने से उसे कोने तक तालाब बनते ही चले आए थे। कोई एक हजार वर्ष तक आबाध गति से चलती रही इस परंपरा में पंद्रहवीं सदी के बाद कुछ बाधाएं आने लगी थी। पर, उस दौर में भी यह धारा पूरी तरह से रूक नहीं पाई,सूखा नहीं पाई। समाज ने जिस काम को इतने लंबे समय तक बहुत व्‍यवस्थित रूप में किया था उस काम को उथल-पुथल का वह दौर भी पूरी तरह से मिटा नहीं सका। आठहरवीं और उन्‍नीसवीं सदी के अंत तक भी जगह-जगह पर तालाब बन रहे थे।लेकिन, फिर बनाने वाले लोग भी धीरे-धीरे कम होते गए। गिनने वाले कुछ जरूर आ गए,पर जितना बड़ा काम था उस हिसाब से गिनने वाले बहुत ही कम थे और कमजोर भी। इसलिए ठीक गिनती भी कभी भी नहीं हो पाई।धीरे-धीरे टुकड़ों में तालाब गिने गए पर सब टुकड़ों को कुल मेल कभी बिठाया नहीं गया। लेकिन, इन टुकड़ों कीझिलमिलाहट  समग्र चित्र की चमक दिखा सकती है।

 राज्‍यों की स्थिति 
उत्‍तर प्रदेश 

  • कुल जल निकाय की संख्‍या - 84,647 
  • जल निकायों से धिरा रकबा - 73,053 हेक्‍टेयर 
  • राज्‍य का रकबा - 240.928 लाख हेक्‍टेयर 
  • एक दशक पहले मौजूद जल निकाय - 84,647 
  • एक दशक पहले मौजूद सतह पर मौजूद जल की मात्रा - 12.21 मिलियन हेक्‍टेयर मीटर 
  • सतह पर उपलब्‍ध जल की वर्तमान मात्रा - 12.21 मिलियन हेक्‍टेयर मीटर
  • प्रदेश में औसतन सालाना बारिश - 235.4 लाख हेक्‍टेयर मीटर पानी की बारिश 
  • सिचाई के लिए उपयोग में सतही पानी की हिस्‍सेदारी - 7.8 मिलियन हेक्‍टेयर मीटर 
सरकारी प्रयासः 
  • हर 52 ग्राम सभाओं के बीच कम से कम एक तालाब बनाना है या मौजूद तालाब जीणोद्धार करवाना
हिमाचल प्रदेश
  • जल निकायों की संख्‍या - 7495
  • राज्‍य का रकबा - 55673 वर्ग किमी
  • कुल रकबे की तुलना में जल निकायों की क्षेत्रफल - 35फीसदी
  • एक दशक पहले जल निकायों की संख्‍या - 5,779
  • सतह उपलब्‍ध जल की वर्तमान मात्रा में कमी -  20 फीसदी
  • सिचार्इ के लिए उपयोग लाए जा रहे सतह पर मौजूद पानी की हिस्‍सेदारी-23,507 एसीएम
  • सालाना औसत बारिश - 1300 मिमी
सरकारी प्रयासः 
  • वाटर मैनेजमेंटबोर्ड केतहत रेन हार्वेस्टिंग स्‍कीम, वन, आइपीएच तथा ग्रामीण विकास विभाग काम कर रहा है 
  • नई जल नीति में पनबिजली परियोजनाओं के लिए कम से कम 15 फीसदी पानी छोड़ने की अनिर्वयता का प्रावधान
झारखंड 
  • कुल जल निकायों की संख्‍या - सरकारी 15,746, निजी तालाब 85,849, कुल 1,01,595 
  • पूरे राज्‍य का रकबा - 79714 वर्ग किमी 
  • कुल रकबों की तुलना में जल निकायों का क्षेत्र - 5 फीसदी 
  • सतह उपलब्‍ध जल की मात्रा - 237890 लाख घन मीटर 
  • सतही पानी की सिंचाई में हिस्‍सेदारी - 17 फीसदी 
  • सालाना औसत बारिश - 1100 - 1200 मिमी 
सरकारी प्रयासः 
  • डैम व तालाबों के गहरे करने की योजना
 पश्चिम बंगाल 
  • जल निकायों की संख्‍या - 5.45 लाख 
  • राज्‍य का रकबा -  88752वर्ग किमी 
  • कार्यरत जल स्‍त्रोतों की संख्‍या - 2.93 लाख 
  • धरती पर उलब्‍ध जल की मात्रा - 13.29मिलियन हेक्‍टेयर मीटर 
सरकारी प्रयासः 
  • सदियों पुराने तालाब, झील, तालाब, तड़ाग और अन्‍य जल स्‍त्रोतों को जीवन करने की योजना का प्रारंभ 
  • वर्ष के जल को संरक्षित करने का कार्य 
 उत्‍तराखंड 
  • उत्‍तराखंड को एशिया का जल स्‍तंभ कहा जाता  है, उत्‍तराखंड से बारह बड़ी नदियां और कई सहायक नदियां निकलती हैंराज्‍य औसतन 1200 मिमी होती हैमानसून के दौरान नदियों का जल स्‍तर कई गुना बढ़ जाता है
  • उत्‍तराखंड में कुल 22707 जल प्राकृतिक जल स्‍त्रोत हैंयह एक वर्ष में प्राकृतिक पेय जल स्‍त्रोतों में पचास फीसदी से ज्‍यादा की गिरावट दर्ज की गई जो  कि चिंता का विषय है
सरकारी प्रयासः 
  • सतह पर मौजूद जल निकायों के संरक्षण के लिए वनीकरण 
  • रेन वाटर हार्वेस्टिंग के जरिए जल स्‍त्रोतों को रिचार्ज करने का प्रयास 
जम्‍मू कश्‍मीर 
  • जल निकायों की संख्‍या - 1248 
  • जल निकायों का रकबा - 291.07वर्ग किमी 
  • राज्‍य का रकबा - 222236 वर्ग किमी 
  • एक दशक पहले जल निकायों की संख्‍या - 38 
  •  सिचाई में प्रयोग किए जा रहे सतही की हिस्‍सेदारी - 25 फीसदी 
  • सालना औसत बारिश -998 मिमी
सरकारी प्रयासः 
  • सतह पर मौजूद जल और जल निकायों के संरक्षण के लिए फरवरी 2011 में वाटर रिसोर्सेस एक्‍ट लागू किया गया एक्‍ट के मुताबिक सरकार पनबिजली परियोजनाओं से किराया बसूलेगी पानी का किराया दोगुना करने के साथ पानी के मीटर लगाने की भी तैयारी है ताकि लोग जरूरत के मुताबिक ही पानी खर्च करें
बिहार 
  • कुल जल स्‍त्रोतों की संख्‍या - 20938 
  • राज्‍य का रकबा - 94163 वर्ग किमी 
  • कार्यरत जल स्‍त्रोतों की संख्‍या - 17683 
  • सतह पर मौजूद जल - 34053घन किमी 
सरकारी प्रयासः 
  • मौर्य काल 327-297 ई पूर्व निर्मित सिंचाई स्‍त्रोत आहर, पइन, व तालाबों को पुनजीर्विजत करने की योजना पर काम शुरू 
  • नदी जोड़ योजना पर काम जारी 
देश में सतह पर मौजूद जल की स्थिति 
  • 14 प्रमुख नदियां, 44 मझोली नदियों और छोटी-छोटी धाराओं में सालाना 1645 हजार मिलियन क्‍यूबिक मीटर (टीमएमसी) पानी बहता है 
  • हर साल 3816 टीमएमसी पानी बारिस से प्राप्‍त होता है 
  • हिमालय क्षेत्र में स्थित 1500 ग्‍लेशियरों की कुल बर्फ का आयतन करीब 1400 घन किमी 
  • जम्‍मू कश्‍मीर में डल और वुलर, आध्र प्रदेश में कोलेरू, उडीसा में चिलका, तमिलनाडु की पुलीक‍ट जैसी कई बड़ी प्राकृतिक झीलें हैं
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