रविवार, 8 अप्रैल 2012

........ तो सुलझ जाती कश्मीर समस्या

Vallabh Bhai Patel
इतिहास कैसे रचा जाता है इसका इतिहास जानने के लिए भारत में वल्लभ भाई पटेल का प्रयास प्रत्यक्ष प्रमाण है। संकल्प, साहस, सूझ-बूझ के धनी पटेल ने तत्कालीन 565 से भी अधिक देशी रियासतों का भारत मे विलीनीकरण करके राष्ट्रीय एकता के सूत्रधार के रूप में इतिहास रच दिया है। भारत को सुदृढ़ बनाना उनका सपना था।

जिसे प्रज्ञा और पुरूषार्थ से उन्होंने
साकार कर दिया। राष्ट्रीय एकता के शिल्पी के रूप में समय स्वयं उनके कृतित्व के चंवर डुलाता है और इतिहास उनके व्यक्तित्व को पलकों पर बैठाता है। उनकी प्रकृति में पुरूषार्थ, संस्कार में स्वाभिमान, सोच में सार्थकता और संवाद मे स्पष्टवादिता थी। मंदिर पर कलश की तरह उनका कृतित्व और बर्फ की चट्टान में आग की तलवार की तरह व्यक्तित्व था। सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात में हुआ था। उनके पिता झबेर भाई बोरसद ताल्लुका के करमसद गांव के निवासी थे। वे पेशे से साधारण किसान थे। उनकी माता लाड़बाई तथा पिता ने साहस, सच्चाई और सादगी के संस्कार तो सिखाए ही पुरूषार्थ और पराक्रम का पाठ भी पढ़ाया। प्रारंभ में प्रांतीय किसान नेता के रूप में तथा आगे चल कर देश के दिग्गज और दिलेर नेता के रूप में वे अपने फौलादी व्यक्तित्व के कारण लौह पुरूष कहलाए।

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दिसंबर 1950 को उनका स्वर्गवास हो गया। सरदार पटेल असत्य के आलोचक और सत्य के समर्थक थे। कितना ही शक्तिशाली व्यक्तित्व क्यों न हो अगर वह अहंकारी व अन्यायी होता तो उसे मुंह पर फटकारने का पटेल में गजब का नैतिक साहस था, लेकिन स्वयं से गलती होने पर स्वीकारने की अद्भुत गुण भी उनमें था। उदाहरण के लिए गुजरात क्लब के आमंत्रण पर जब महात्मा गांधी व्याख्यान देने आए तो पटेल ने गांधी जी की उपेक्षा करते हुए कहा मैं इस प्रकार सत्‍यागृहीयों को समर्थन नहीं करता हूं
ये लोग अंजीनिर्वासी करके परम शक्तिशाली ब्रिटिश शासन को यहां से उखाड़ फेंकेगे मुझे इसमें बहुत संदेह है।" लेकिन कालांतर में चंपारण जिले में गांधी जी द्वारा जा रहे सत्‍यागृह को देखकर चमत्कृत और अभिभूत हो गए थे। तब से वे गांधी जी कीआंदोलन पद्धति के प्रशंसक और भक्त बन गए थे। यही कारण था कि उन्होंने सत्याग्रह के महात्मा गांधी के दर्शन को क्रांतिकारी निरूपित किया। उन्होंने खुद सत्याग्रह के कई प्रयोग करके अन्याय व आतंक को ध्वस्त किया। गांधी जी के साथ उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। जिससे उनकी संघर्ष शक्ति और बढ़ गई। नागपुर का झंडा सत्याग्रह, बारडोली का ताल्लुका सत्याग्रह, उनकी ख्याति मे चार चांद लगा गया।
वे टे्रड यूनियन संबंधी सुधारों और आंदोलनों के भी प्रेरणा पुंज थे। जब भारत आजाद हुआ तो जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व मे उन्हें गृह विभाग के साथ-साथ देशी रियासतों का विभाग भी दिया गया। पटेल ने विवेक और- पुरूषार्थो का प्रयोग करके देशी रियासतों का भारत में विलीनीकरण करके भारत को एकता के सूत्र में पिरोया। यह उनकी दूरदृष्टि और व्यूह रचना का परिणाम था कि जूनागढ़ और हैदराबाद रियासतों का विलय उन्होंने भारत में कराया। हैदराबाद विलय टेढ़ी खीर था, लेकिन पटेल ने अपने अदम्य साहस से वह कर दिखाया।
शेख अब्दुला के प्रभाव में आकर नेहरू जी ने कश्मीर मामले को पटेल के रियासत विभाग से अलग कर दिया। बतौर प्रधानमंत्री नेहरू जी ने कश्मीर को विशेष्ा राज्य के रूप में अपने हाथ में ले लिया था। बाद में कश्मीर के मामले को नेहरू जी संयुक्त राष्ट्र में लेकर गए तब से ही कश्मीर की समस्या सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। पटेल की एक शक्तिशाली सैनिक कार्रवाई कश्मीर समस्या को सदा के लिए सरलता से सुलझा सकती थी। पटेल ने बड़े दुख से कहा था कि "जवाहरलाल और गोपालस्वामी अयंगर ने कश्मीर को व्यक्तिगत विष्ाय बनाकर मेरे गृह विभाग तथा रियासत विभाग से अलग न किया होता तो कश्मीर समस्या उसी प्रकार हल होती जैसे हैदराबाद की।"
साभार .........

युवा पीढी ‘चुनौती’ के लिए चुनौती


Swami Vivekanand
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दौर कोई भी हो , युवा पीढ़ी ने उसे अपने दम पर "जोर" से "दौर" बदला है। कला का क्षेत्र हो या विज्ञान का, क्रीड़ा का क्षेत्र हो या ध्यान का, युवा पीढ़ी ने साहस की स्याही और कर्म की कलम से उपलब्धियों की इबारत लिखी है। यद्यपि हर युग में युवा पीढ़ी के सामने प्रश्नों के पर्वत खड़े किए गए हैं तथापि अपनी प्रतिभा और पुरूषार्थ से युवाओं ने ये पर्वत लांघकर निंदकों को निरूत्तर कर दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जब युवाओं को योग्यता होने के बावजूद औचित्य नहीं मिलता, प्रतिभा के बावजूद प्रतिसाद प्राप्त नहीं होता, परिश्रम के बावजूद पुरस्कार नसीब नहीं होता तो अवसादग्रस्त हो जाती है, लेकिन शीघ्र ही नए जोश और जज्बे के साथ वह अवसाद को अंगूठा दिखा देती है। जैसे फीनिक्स पक्षी के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी ही राख से दुबारा जन्म ले लेता है, ठीक वैसा ही मामला युवा पीढ़ी का है। वर्तमान का जो परिदृश्य है उसमें दिखाई दे रहा है कि युवा पीढ़ी अपेक्षित सफलता नहीं मिलने पर कुछ दिन अनमनी रहती है। लेकिन अवसाद के अंधेरे में पुन: प्रेरणा का प्रकाश खोज लेती है तथा नए सिरे से सामर्थ्‍य और साहस के साथ लक्ष्य प्राप्ति के लिए जुट जाती है। युवा पीढ़ी का यह सामर्थ्‍य  प्रभावित करता है और साहस अभिभूत करता है।

युवा पीढ़ी
दरअसल चुनौती के लिए चुनौती, बाधा के लिए बाधा, कठिनाई के लिए कठिनाई होती है। संकट के सैलाब में जीवटता से जूझकर सुरक्षित तट पर पहुंचने का नाम ही युवा पीढ़ी है। युवा पीढ़ी का जज्बा और जीवटता ही देश के लिए आईटी से लेकर इंडस्ट्री तक इतिहास रच रहा है। पिछले सप्ताह ही इलाहाबाद का एक युवा छात्र अपने टेक्निकल टैलेंट यानी तकनीकी प्रतिभा से मीडिया की सुर्खियां बटोर गया। भारतीय युवा के इस सामथ्र्य को सराहा गया और वह भी विश्व की प्रतिष्ठित कंपनी द्वारा। सुरक्षागत कारणों से युवा छात्र का नाम नहीं बताया गया लेकिन अपनी प्रतिभा के कारण उसे जिस पैकेज का ऑफर कंपनी ने किया था वह विश्व में किसी युवा छात्र को अब तक मिलने वाला सर्वोच्च/ सर्वाधिक "सैलेरी पैकेज " था, यानी करोड़ों में।

इससे सिद्ध होता है कि
भारतीय युवा पीढ़ी में प्रतिभा वैसे ही छिपी है जैसे किसी पुष्प में सुगंध। आवश्यकता है इस सुगंध को महसूस करने वाली नाक की। जिस नाक ने इस सुगंध को महसूस किया वह थी विदेश की। हमारे यहां भी नाक तो है लेकिन वह युवा प्रतिभा की सुगंध महसूस करने की बजाय "नाक-भौं" सिकोड़ती है। कुछ लोग तो ऎसे हैं जो युवाओं में केवल दोष ही देखते हैं। माना कि इंटरनेट और लैपटॉप के इस युग में युवा पीढ़ी "साइबर एडिक्ट" होकर थोड़ी-सी डगमगा गई है लेकिन यह हमारा दायित्व है कि हम युवाओं की रचनाशीलता को रवानी दें ताकि वे अपनी ऊर्जा से विकास की नई कहानी लिख सकें। किसी कवि की युवा पीढ़ी के बारे में ये काव्य पंक्तियां उल्लेखनीय हैं- "यह सागर की लहरों की रवानी ही तो है/ रचना की पगडंडी की कहानी ही तो है/ डगमगाए तो संभालो, कोसो न इसे/डगमगाएगी आखिर जवानी ही तो है।"

इतिहास इस बात का साक्षी है कि युवा पीढ़ी
को हर दौर में जूझना पड़ा और संदेह का सलीब हर युग में ढोना पड़ा, लेकिन युवा पीढ़ी हर काल में चुनौती के लिए चुनौती बनी। जैसे त्रेतायुग में युवा लक्ष्मण ने परशुराम को चुनौती दी, द्वापर में यानी महाभारतकाल में युवा अभिमन्यु ने चक्रव्यूह की चुनौती को स्वीकारा और अपने दम से महारथियों की नाम में दम कर दिया। वर्तमान दौर में युवा पीढी अपने हौसलों के हथोडों से चुनौनियों के पहाडों को तोड रहे हैं । आज जरूरत है कि हम युवाओं को प्रेरणा दें, प्रताड़ना नहीं, क्योंकि युवा पीढ़ी  राष्‍ट्र की उर्जा है, वह ही देश को विश्‍व का सिरमौर बना सकता है

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