रविवार, 8 अप्रैल 2012

युवा पीढी ‘चुनौती’ के लिए चुनौती


Swami Vivekanand
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दौर कोई भी हो , युवा पीढ़ी ने उसे अपने दम पर "जोर" से "दौर" बदला है। कला का क्षेत्र हो या विज्ञान का, क्रीड़ा का क्षेत्र हो या ध्यान का, युवा पीढ़ी ने साहस की स्याही और कर्म की कलम से उपलब्धियों की इबारत लिखी है। यद्यपि हर युग में युवा पीढ़ी के सामने प्रश्नों के पर्वत खड़े किए गए हैं तथापि अपनी प्रतिभा और पुरूषार्थ से युवाओं ने ये पर्वत लांघकर निंदकों को निरूत्तर कर दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जब युवाओं को योग्यता होने के बावजूद औचित्य नहीं मिलता, प्रतिभा के बावजूद प्रतिसाद प्राप्त नहीं होता, परिश्रम के बावजूद पुरस्कार नसीब नहीं होता तो अवसादग्रस्त हो जाती है, लेकिन शीघ्र ही नए जोश और जज्बे के साथ वह अवसाद को अंगूठा दिखा देती है। जैसे फीनिक्स पक्षी के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी ही राख से दुबारा जन्म ले लेता है, ठीक वैसा ही मामला युवा पीढ़ी का है। वर्तमान का जो परिदृश्य है उसमें दिखाई दे रहा है कि युवा पीढ़ी अपेक्षित सफलता नहीं मिलने पर कुछ दिन अनमनी रहती है। लेकिन अवसाद के अंधेरे में पुन: प्रेरणा का प्रकाश खोज लेती है तथा नए सिरे से सामर्थ्‍य और साहस के साथ लक्ष्य प्राप्ति के लिए जुट जाती है। युवा पीढ़ी का यह सामर्थ्‍य  प्रभावित करता है और साहस अभिभूत करता है।

युवा पीढ़ी
दरअसल चुनौती के लिए चुनौती, बाधा के लिए बाधा, कठिनाई के लिए कठिनाई होती है। संकट के सैलाब में जीवटता से जूझकर सुरक्षित तट पर पहुंचने का नाम ही युवा पीढ़ी है। युवा पीढ़ी का जज्बा और जीवटता ही देश के लिए आईटी से लेकर इंडस्ट्री तक इतिहास रच रहा है। पिछले सप्ताह ही इलाहाबाद का एक युवा छात्र अपने टेक्निकल टैलेंट यानी तकनीकी प्रतिभा से मीडिया की सुर्खियां बटोर गया। भारतीय युवा के इस सामथ्र्य को सराहा गया और वह भी विश्व की प्रतिष्ठित कंपनी द्वारा। सुरक्षागत कारणों से युवा छात्र का नाम नहीं बताया गया लेकिन अपनी प्रतिभा के कारण उसे जिस पैकेज का ऑफर कंपनी ने किया था वह विश्व में किसी युवा छात्र को अब तक मिलने वाला सर्वोच्च/ सर्वाधिक "सैलेरी पैकेज " था, यानी करोड़ों में।

इससे सिद्ध होता है कि
भारतीय युवा पीढ़ी में प्रतिभा वैसे ही छिपी है जैसे किसी पुष्प में सुगंध। आवश्यकता है इस सुगंध को महसूस करने वाली नाक की। जिस नाक ने इस सुगंध को महसूस किया वह थी विदेश की। हमारे यहां भी नाक तो है लेकिन वह युवा प्रतिभा की सुगंध महसूस करने की बजाय "नाक-भौं" सिकोड़ती है। कुछ लोग तो ऎसे हैं जो युवाओं में केवल दोष ही देखते हैं। माना कि इंटरनेट और लैपटॉप के इस युग में युवा पीढ़ी "साइबर एडिक्ट" होकर थोड़ी-सी डगमगा गई है लेकिन यह हमारा दायित्व है कि हम युवाओं की रचनाशीलता को रवानी दें ताकि वे अपनी ऊर्जा से विकास की नई कहानी लिख सकें। किसी कवि की युवा पीढ़ी के बारे में ये काव्य पंक्तियां उल्लेखनीय हैं- "यह सागर की लहरों की रवानी ही तो है/ रचना की पगडंडी की कहानी ही तो है/ डगमगाए तो संभालो, कोसो न इसे/डगमगाएगी आखिर जवानी ही तो है।"

इतिहास इस बात का साक्षी है कि युवा पीढ़ी
को हर दौर में जूझना पड़ा और संदेह का सलीब हर युग में ढोना पड़ा, लेकिन युवा पीढ़ी हर काल में चुनौती के लिए चुनौती बनी। जैसे त्रेतायुग में युवा लक्ष्मण ने परशुराम को चुनौती दी, द्वापर में यानी महाभारतकाल में युवा अभिमन्यु ने चक्रव्यूह की चुनौती को स्वीकारा और अपने दम से महारथियों की नाम में दम कर दिया। वर्तमान दौर में युवा पीढी अपने हौसलों के हथोडों से चुनौनियों के पहाडों को तोड रहे हैं । आज जरूरत है कि हम युवाओं को प्रेरणा दें, प्रताड़ना नहीं, क्योंकि युवा पीढ़ी  राष्‍ट्र की उर्जा है, वह ही देश को विश्‍व का सिरमौर बना सकता है

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