बुधवार, 11 अप्रैल 2012

संकट में पानी


समुद तटीय इलाकों और सागरों पर पर्यावरण को विनाश करने वाली क्रियाओं के कारण महासागर भारी खतरे में है।

- महासागर एक गतिशील और जटिल व्यवस्था है जो जीवन के लिए अत्यन्त महत्तवपूर्ण है। महासागरों में मौजूद असीम सम्पदा समान रूप से वितरित नहीं है। उदाहरण के लिए, सर्वाधिक समुद्री जैव विविधता समुद्र तल पर पाई जाती है। महासागरों की उत्पादकता को निर्धारित करने वाली पर्यावरणीय परिस्थितियां समय और स्थान के अनुसार भिन्न-भिन्न हैं।

- सर्वाधिक महत्तवपूर्ण फिशिंग ग्राउंड समुद्र तट से 200 से भी कम मील क्षेत्र के भीतर महाद्वीपीय समतलों पर पाए जाते हैं। ये फिशिंग ग्राउंड भी असमान रूप से देखे गए हैं और अधिकांशत: स्थानीय हैं।

- 2004 में आधे से भी अधिक समुद्र लैंडिंग फिशिंग, समुद्र तट के 100 किमी. के भीतर पकड़ी गई है, जिसकी गहराई आमतौर पर 200 मी. है और यह विश्व के महासागरों का 7.5 फीसदी से भी कम दायरा कवर करता है।

- ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज ने महासागरों की उत्पादकता और स्थायित्व के लिए बहुत सी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों में उथले पानी में, तापमाप में, 3 डिग्री से 0 डिग्री तक की वृद्धि 2100 तक वार्षिक या द्विवार्षिक मूंगों का सफाया हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि 2080 तक विश्व में 80-100 फीसदी तक मूंगें खत्म हो जाएंगे।



जब वातावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है तब कार्बन महासागरों में एकत्रित हो जाता है और एक प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रिया के तहत उसका अम्लीकरण होने लगता है जिसका प्रभाव ठंडे पानी, मूगों और सीपियों पर पड़ता है।

- समुद्र तटों पर और जमीन में विकासात्मक क्रियाएं 2050 तक, आवासीय समुद्रतटों की क्रियाओं की अपेक्षा अधिक प्रभावित कर सकती है और पूरे समुद्र प्रदूषण के 80 फीसदी से भी अधिक खतरा पैदा कर सकती हैं।

- बढ़ता हुआ विकास, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन सभी मृत समुद्री क्षेत्र (कम ऑक्सीजन वाले क्षेत्र) बढ़ा रहे हैं। बहुत से तो प्राथमिक फिशिंग ग्राउंड पर या उसके आसपास है, जो फिश स्टॉक को भी प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे क्षेत्र 2013 में 149 से बढ़कर 2006 में 200 से भी अधिक हो गए हैं।

- आक्रामक प्रजातियां भी प्राथमिक फिशिंग ग्राउंड के लिए खतरा हैं। गिट्टी पोत (पानी, जो बन्दरगाहों और खाड़ी से, जहाजों द्वारा स्थिरता बनाए रखने के लिए ले जाया जाता है) भी आक्रामक प्रजातियों को लाने में महत्वपूर्ण तत्व हैं।

- महासागरों की देखभाल के लिए आंकड़ों और धन का अभाव, समुद्री पर्यावरण को और ज्यादा बदतर बना रहा है। देशों को समुद्रों पर जलवायु और गैर-जलवायुगत दवाबों को कम करने के लिए तत्काल उपाय करना चाहिए ताकि संसाधनों को बचाया जा सके। इसके लिए दुनिया भर में सामुद्रिक नीतियों में परिवर्तन की आवश्यकता है।

गायब होते ग्लेशियर


बढ़ते तापमान का भारतीय ग्लेशियरों पर बुरा असर पड़ रहा है और अगर ग्लेशियरों के पिघलने की यही रफ्तार रही तो हिमालय के ग्लेशियर 2035 तक गायब हो जाएंगे। अध्ययन में पाया गया है कि हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बहुत तेज है। शोधकर्ताओं का कहना है कि कश्मीर में कोल्हाई ग्लेशियर पिछले साल 20 मीटर से अधिक पिघल गया है जबकि दूसरा छोटा ग्लेशियर पूरी तरह से लुप्त हो गया है। हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय भूभौतिकी अनुसंधान संस्थान के मुनीर अहमद का कहना है कि ग्लेशियरों के इस कदर तेजी से पिघलने की वजह ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ ब्राउन क्लाउड है। 

दरअसल, ब्राउन क्लाउड प्रदूषण युक्त वाष्प की मोटी परत होती है और ये परत तीन किलोमीटर तक मोटी हो सकती है। इस परत का वातावरण पर विपरीत असर होता है और ये जलवायु परिवर्तन में अहम भूमिका निभाती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी यूएनईपी की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की तलहटी में भी काले धूल के कण हैं और इनका घनत्व प्रदूषण वाले शहरों की तरह है। 

शोधकर्ताओं का कहना है कि क्योंकि काली-घनी सतह ज्यादा प्रकाश और ऊष्मा सोखती है, लिहाजा ग्लेशियरों के पिघलने की ये भी एक वजह हो सकती है। अगर ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार अंदाज़े के मुताबिक ही रही तो इसके गंभीर नतीजे होंगे। दक्षिण एशिया में ग्लेशियर गंगा, यमुना, सिंधु, ब्रह्मपुत्र जैसी अधिकांश नदियों का मुख्य स्रोत हैं। ग्लेशियर के अभाव में ये नदियां बारहमासी न रहकर बरसाती रह जाएंगी और कहने की ज़रूरत नहीं कि इससे लाखों, करोड़ों लोगों का जीवन सूखे और बाढ़ के बीच झूलता रहेगा। 

ग्लेशियरों के ख़तरे



नेपाल के एक युवा पर्वतारोही जलवायु परिवर्तन के भीषण परिणामों की तरफ़ लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए माउंट एवरेस्ट की यात्रा करेंगे। दावा स्टीवन शेरपा नाम के इस पर्वतारोही की उम्र महज 23 वर्ष है लेकिन वह इस उम्र में ही एवरेस्ट सहित दुनिया की कई उँची पर्वतमालाओं को लांघ चुके हैं। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने हिमालय पर मौज़ूद ग्लैशियरों को पिघलते हुए देखा तो उनके मन में आया कि क्यों न आम लोगों का ध्यान पर्यावरण के मुद्दों की तरफ खींचा जाए। बेल्जियम और नेपाली मिश्रित मूल के स्टीवन शेरपा का कहना है कि वर्ष 2007 में जब वह पर्वतारोहण कर रहे थे तो खुमबु आईस फॉल के दौरान उन्हें एक डरावना अनुभव हुआ। दावा मानते हैं कि ग्लोवल वार्मिंग की वजह से ही उस दिन हिम नदी पिघली थी। 

वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय पर मौजूद सैकड़ों ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन की वजह से पिघल रहे हैं। ये ग्लेशियर पाकिस्तान से लेकर भूटान तक फैले हैं। इन पिघलते हुए ग्लेशियरों के कारण कुछ नई झील बन गई हैं जिनसे इन घाटियों में बाढ़ आने का ख़तरा बढ़ गया है। नेपाल स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट ने अनुमान व्यक्त किया है कि वर्ष 2050 तक इस तरह के सारे हिमनद पिघल जाँएंगे जिससे इस क्षेत्र में पहले बाढ़ और फिर अकाल आने का ख़तरा बढ़ रहा है। संस्था के मुताबिक हिमालय से निकलने वाली नदियों पर कुल मानवता का लगभग पाँचवां हिस्सा निर्भर है। 

विकसित देशों में प्रदूषण बढ़ा


जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी का कहना है कि औद्योगिक देशों में वर्ष 2000 से 2006 के बीच ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 2।3 प्रतिशत बढ़ा है। कार्बन गैसों में सबसे यादा बढ़ोत्तरी पूर्व सोवियत संघ के देशों और कनाडा में हुई है। संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने कहा है कि यदि ख़तरनाक जलवायु परिवर्तन को रोकना है तो देशों को ज्यादा तेजी से कार्रवाई करनी होगी। दुनिया भर के देश अगले महीने पोलैंड में जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करने के लिए मिलने वाले हैं और प्रदूषण के जो नए ऑंकड़े आए हैं वो आशाजनक नहीं हैं। 

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हालांकि वर्ष 2006 में दुनिया भर में कार्बन गैसों के उत्सर्जन में 0.01 प्रतिशत की गिरावट आई। लेकिन संयुक्त राष्ट्र सचिवालय का कहना है कि सांख्यिकी की दृष्टि से इस कमी का कोई महत्व नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2000 के बाद से कार्बन गैसों में बढ़ोत्तरी दिख रही है। हालांकि जिन देशों में कार्बन गैसों में बढ़ोत्तरी हुई है उन देशों ने गैसों में कटौती का आश्वासन दिया था। इस मामले में सबसे बड़ा दोषी देश कनाडा दिख रहा है। 

रिपोर्ट के अनुसार 1990 से अब तक वहाँ कार्बन गैसों में 21.3 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है जबकि इसमें छह प्रतिशत की कमी होनी चाहिए थी। हाल के समय में सबसे ज्यादा गैसों का उत्सर्जन पूर्वी एशियाई देशों में दर्ज किया गया है। वर्ष 2000 के बाद से यहाँ 7।4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। ब्रिटेन उन चुनिंदा देशों में से है जो अपने कार्बन गैसों पर नियंत्रण रख पा रहा है। हालांकि ब्रिटेन सरकार को दी गई एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि हवाई जहा और समुद्री पोतों के चलते वहाँ प्रदूषण बढ़ रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार वहाँ आयात की जा रही सामग्री में मौजूद कार्बन के कारण भी इसमें बढ़ोत्तरी हुई है। 

वनों से बढ़ता पृथ्वी का तापमान!


वैज्ञानिकों का कहना है कि पेड़ भी जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार हैं ऐसे में जब बर्फीले इलाकों में पेड़ लगाने से पृथ्वी के तापमान में और वृध्दि हो सकती है क्योंकि पेड़ गरमी को परावर्तित नहीं होने देते। अमरीकी शोधकर्ताओं का मानना है कि बर्फीले इलाकों में पेड़ों के काटे जाने से पृथ्वी के बढ़ते तापमान को रोकने की कोशिशों में मदद मिल सकती है। यह शोध नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित हुआ है और इसमें पर्यावरण की इस जटिलता को उजागर किया गया है। अभी तक यह माना जाता रहा है कि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से दुनिया के तापमान में वृध्दि हो रही है। 

दरअसल पेड़ों की पत्तियां कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों को वातावरण से हटा देती हैं। लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि रूस, यूरोप और कनाडा के बर्फीले इलाकों के पेड़ों की पत्तियां बर्फ को ढक लेती हैं जिससे वह इसे परावर्तित नहीं कर पाती हैं। इससे पृथ्वी पर सूरज की रोशनी का अधिक अवशोषण होता है। हालांकि वैज्ञानिकों ने इससे बचने के लिए पेड़ों को काटे जाने को नहीं कहा है। 

उल्लेखनीय है कि हाल में जलवायु परिवर्तन पर जारी एक अहम रिपोर्ट में कहा गया है कि इसकी वजह से करोड़ों लोगों को पानी नहीं मिलेगा, फसलें चौपट हो जाएँगीं और बीमारियाँ फैलेंगी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के परिणाम पूरी दुनिया में दिखाई देने लगे हैं। रिपोर्ट में एक धुँधले भविष्य की तस्वीर दिखाई गई है। इसके अनुसार भविष्य में पानी की किल्लत होगी। साथ ही बाढ़ एक सामान्य समस्या होगी, बीमारियाँ तेज़ी से बढ़ेंगी। इसके अनुसार फसलों में लगातार कमी आएगी और लाखों लोग भूखे रहेंगे। इसमें कहा गया है कि दोनों ध्रुव, अमेरीका, एशिया और प्रशांत महासागर के छोटे द्वीप इसके निशाने पर होंगे। 

उत्सर्जन में कटौती पर मतभेद


जलवायु परिवर्तन पर बाली सम्मेलन के अंतिम दिन ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिए लक्ष्य तय करने पर फिर गहरे मतभेद उभर आए हैं। अमेरिका किसी तरह के लक्ष्य निर्धारण के पक्ष में नहीं है जबकि यूरोपीय संघ ने चेतावनी दी है कि लक्ष्य तय करने में नाकामी हाथ लगी तो वो अगले महीने जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका की अगुआई में होने वाले सम्मेलन का बहिष्कार करेंगे। अमेरिका का मत है कि अलग-अलग देशों को ख़ुद ही प्रदूषण फैलानी वाली गैसों के उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य तय करने की छूट मिलनी चाहिए। 

इंडोनेशिया यूरोपीय देशों और अमरीका के बीच किसी तरह का समझौता कराने की कोशिश कर रहा है। उसकी कोशिश है कि स्पष्ट लक्ष्य निर्धारण को समझौते के अंतिम मसौदे से निकाल दिया जाए, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईपीसीसी के साथ नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले अल गोर ने सम्मेलन में हिस्सा ले रहे सदस्यों से हार नहीं मानने की अपील की। अधिकारियों का कहना है कि कई मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। मतभेद औद्योगिक देशों में प्रदूषण के विषय पर है। 

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

गंगा एक कारपोरेट एजेंडा



गंगा की अविरलता-निर्मलता विश्व बैंक के धन से नहीं, जन-जन की धुन से आएगी। गंगा संरक्षण की नीति, कानून बनाने तथा उन्हें अमली जामा पहनाने से आएगी। जानते हुए भी क्यों हमारी सरकारें ऐसा नहीं कर रहीं। ऐसा न करने को लेकर राज्य व केंद्र की सरकारों में गजब की सहमति है। क्यों? पनबिजली परियोजनाओं में जांघिया-बनियान बनाने से लेकर साइकिल बनाने वालों तक का पैसा लगा है। क्योंकि गंगा, अब राजनैतिक नहीं, एक कार्पोरेट एजेंडा है।
बिस्मिल्लाह खां ने कहा, ‘गंगा और संगीत एक-दूसरे के पूरक हैं।’ है कोई, जो गंगा का उसका बिसरा संगीत लौटा दे? है कोई, जो गंगोत्री ग्लेशियर का खो गया गौमुखा स्वरूप वापस ले आए? गंगा के मायके में उसका अल्हड़पन, मैदान में उसका यौवन और ससुराल में उसकी गरिमा देखना कौन नहीं चाहता? कौन नहीं चाहता कि मृत्यु पूर्व दो बूंद पीने की लालसा वाला प्रवाह लौट आए? गंगा फिर से सुरसरि बन जाए? मैं उस देश का वासी हूं,जिस देश में गंगा बहती है’- इस गीत को गाने का गौरव भला कौन हिंदुस्तानी नहीं चाहेगा? लेकिन यह हो नहीं सकता। जिस तरह बिस्मिल्लाह की शहनाई लौटाने की गारंटी कोई नहीं दे सकता, गंगा की अविरलता और निर्मलता की गारंटी देना भी अब किसी सरकार के वश की बात नहीं है। इसलिए नहीं कि यह नामुमकिन है; इसलिए कि अब पानी एक ग्लोबल सर्विस इंडस्ट्री है और भारतीय जलनीति कहती है-वाटर इज कमोडिटी। जल वस्तु है तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी- पर्यावरण की नियंता, मां वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र! 

हम पानी के वैश्विक कारोबारियों के चंगुल में


जो दुनिया चलाते हैं, उन्हें पानी से ज्यादा पानी की सेवा देने में रुचि है। पानी की सेवा में सबसे बड़ी मेवा है। सेवा दो, मेवा कमाओ। इसी कमाई के बूते तो वे दुनिया की प्रथम सौ कंपनियों में स्थान रखती हैं। आरडब्ल्यूई ग्रुप, स्वेज, विवन्डी, एनरॉन आदि। विवन्डी विश्व में पानी की सबसे बड़ी सेवादाता है। स्वेज 120 देशों की सेवा करती है तो भला भारत को कैसे छोड़ दे? लेकिन जब तक भारत में गंगा जैसा सर्वश्रेष्ठ प्रवाह घटेगा नहीं, गुणवत्ता मरेगी नहीं, आप शुद्ध पानी की सेवा के लिए किसी को क्यों आमंत्रित करेंगे? सो प्रवाह घटाना है, गुणवत्ता मारनी है। फिर सेवा लेने के लिए पैसा न हो तो कर्ज देने के लिए वे हैं न; विश्व बैंक, यूरोपियन कमीशन और एडीबी। शर्तों में बांधने डब्ल्यूटीओ और गैट्स। उनका अनुमान नहीं, बिजनेस टारगेट है कि 2015 तक दुनिया जल और उसकी स्वच्छता के लिए 180 बिलियन डॉलर खर्च करे। 2025 तक हर तीन में से दो आदमी स्वच्छ जल की कमी महसूस करे। 2050 तक दुनिया की 70 प्रतिशत आबादी पानी का संकट झेले। 

यह तभी होगा जब भूजल गिरे। इसके लिए गांवों को कस्बा, कस्बों को शहर और शहरों को महानगर बनाओ। बंद पाइप और बंद बोतल पानी की खपत बढ़ाओ। सिर्फ जल संचयन! जल संचयन! चिल्लाओ। करो मत। जरूरत पड़े तो ट्यूबवेल, बोरवेल और समर्सिबल से धकाधक पानी खींचते जाओ। फिर पानी की कमी होने लगे तो जलनियंत्रक प्राधिकरण बनाओ। हमें बुलाओ। पीपीपी चलाओ। बूट अपनाओ। पानी की कीमतें बढ़ाओ। याद रखो! पानी खींचने वाली कोक, पेप्सी और व्हिस्की पीने के लिए है। पानी लड़ने और मरने के लिए। एक दिन भूजल खाली हो ही जाएगा और आप लड़ने भी लगोगे।

भारत के 70 फीसद भूजल भंडार खाली


1990 के 230 लाख की तुलना में आज भारत में 630 लाख कस्बे हैं। भारत में आपके 70 प्रतिशत भूजल भंडार खाली हो चुके हैं और आप पानी के लिए लड़ने भी लगे हो और पानी की बीमारियों से बीमार होकर मरने भी। स्वच्छ पानी के बाजार का जो लक्ष्य हमने 2015 के लिए रखा था, आपने तो उसे 2012 में ही हासिल करा दिया। अब भारत की नदियों को मरना चाहिए। नदियां मरेंगी, तभी धरती सूखेगी, तभी खेती मरेगी। लोग मलीन बस्तियों को पलायन करेंगे। खाद्य सुरक्षा घटेगी। कीमतें बढ़ेंगी। खाद्य सुरक्षा कानून बनाना पड़ेगा। खाद्य आयात बढ़ेगा। जीडीपी का ढोल फूटेगा। साथ ही तुम्हारा भी। तुम हमें सिक्योरिटी मनी दे देना। हम तुम्हें फूड, वाटर.. जो-जो कहोगे, सब की सिक्योरिटी दे देंगे। इसके लिए नदी-जोड़ करो। नदियों से जलापूर्ति बढ़ाओ। बिजली बनाने के नाम पर पानी रोको। नदियों के किनारे एक्सप्रेस-वे बनाओ। 

इंडस्ट्रीज को पानी की कमी का आंकड़ा दिखाओ। नदियों में अधिक पानी का फर्जी आंकड़ा दिखाकर उनके किनारे-किनारे इंडस्ट्रीयल कॉरीडोर बनाओ। टाउनशिप बनाओ। उनका कचरा नदियों में बहाओ। ‘दो बूंद जिंदगी की’ से आगे बढ़कर यूनीसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन की राय को और बड़ा बाजार दिलाओ। एक दिन तुम असल में अपाहिज हो जाओगे। आबादी खुद ब खुद घट जाएगी। न गरीब रहेगा, न गरीबी। तुम भी हमारी तरह विकसित कहलाओगे। आज भारत में यही सब हो रहा है। यदि इसके पीछे कोई इशारा न होता, तो क्या गांव धंसते रहते, धाराएं सूखती रहतीं, विस्फोटों से पहाड़ हिलते रहते, जीवों का पर्यावास छिनता रहता और सरकारें पनबिजली परियोजनाओं को मंजूरी देती रहतीं? भूकंप में विनाश का आंकलन की बिना पर इंदिराजी द्वारा रोके जाने और सरकारी समिति द्वारा रद्द कर दिए जाने के बावजूद टिहरी परियोजना को आखिर मंजूरी क्यों दे दी गई? 

मनाही के बावजूद जारी क्यों हैं पनबिजली परियोजनाएं



अलकनंदा और भागीरथी पर प्रस्तावित यदि 53 बिजली परियोजनाएं बन गई तो दोनों नदियां सूख जाएंगी’-कैग की इस चेतावनी के बावजूद क्या हम परियोजनाएं रोक रहे हैं? तय मानक टरबाइन में नदी का 75 प्रतिशत पानी डालने की इजाजत देते हैं। उत्तराखंड की ऊर्जा नीति 90 प्रतिशत की इजाजत देती है। इस पर कैग की आपत्ति के बावजूद क्या ऊर्जा नीति बदली? परियोजनाओं के लिए और नदी के लिए हमें कर्ज देने वाले संगठनों के सदस्य देश अपने यहां बड़े और मंझोले बांधों को तोड़ रहे हैं और हमें बनाने के लिए कर्ज दे रहे हैं। क्यों? हमें मालूम है कि मलशोधन का वर्तमान तंत्र फेल है। फिर भी, हम उसी में पैसा क्यों लगा रहे हैं? मालूम है कि उद्योग नदियों में जहर बहा रहे हैं। फिर भी उन्हें नदियों से दूर भगाते क्यों नहीं? प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्रदूषण नियंत्रित करने के बजाय सिर्फ ‘प्रदूषण नियंत्रण में है’ के प्रमाणपत्र ही क्यों बांट रहे हैं? नदियों को तटबंधों में बांधने की भूल कोसी-दामोदर में हम झेल रहे हैं। फिर भी एक्सप्रेसवे नामक तटबंध क्यों बना रहे हैं? दिल्ली-मुंबई कॉरीडोर में आने वाली नदियों में अधिक पानी का गलत आंकलन आगे बढ़ा रहे हैं। क्यों? 

हमें मालूम है कि राज्यों पर जवाबदेही टालने के बजाय केंद्र को एक जिम्मेदार भूमिका निभानी होगी। गंगा की अविरलता-निर्मलता विश्व बैंक के धन से नहीं, जन-जन की धुन से आएगी। गंगा संरक्षण की नीति, कानून बनाने तथा उन्हें अमली जामा पहनाने से आएगी। जानते हुए भी क्यों हमारी सरकारें ऐसा नहीं कर रहीं। ऐसा न करने को लेकर राज्य व केंद्र की सरकारों में गजब की सहमति है। क्यों? इन सभी क्यों का जवाब एक ही है; क्योंकि गंगा में गंगा नहर और शारदा सहायक के रास्ते विश्व बैंक का निवेश है। एक्सप्रेस वे की परिकल्पना में उसका भी हाथ है। सोनिया विहार संयंत्र के माध्यम से दिल्ली वालों के पानी के बिल का पैसा स्वेज को कमाई करा रहा है। पनबिजली परियोजनाओं में जांघिया-बनियान बनाने से लेकर साइकिल बनाने वालों तक का पैसा लगा है। क्योंकि गंगा, अब राजनैतिक नहीं, एक कार्पोरेट एजेंडा है।
गंगा नदी पर बनते बांध परियोजनाएं

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

भारत की नदियां


India's Rivers

भारत की नदियों को चार समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे, हिमाचल से निकलने वाली नदियाँ, डेक्‍कन से निकलने वाली नदियाँ, तटवर्ती नदियाँ ओर अंतर्देशीय नालों से द्रोणी क्षेत्र की नदियाँ। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बर्फ और ग्‍लेशियरों के पिघलने से बनी हैं अत: इनमें पूरे वर्ष के दौरान निरन्‍तर प्रवाह बना रहता है। मॉनसून माह के दौरान हिमालय क्षेत्र में बहुत अधिक वृष्टि होती है और नदियाँ बारिश पर निर्भर हैं अत: इसके आयतन में उतार चढ़ाव होता है। इनमें से कई अस्‍थायी होती हैं। तटवर्ती नदियाँ, विशेषकर पश्चिमी तट पर, लंबाई में छोटी होती हैं और उनका सीमित जलग्रहण क्षेत्र होता है। इनमें से अधिकांश अस्‍थायी होती है। इनमें से अधिकांश अस्‍थायी होती हैं। पश्चिमी राजस्‍थान के अंतर्देशीय नाला द्रोणी क्षेत्र की कुछ्‍ नदियाँ हैं। इनमें से अधिकांश अस्‍थायी प्रकृति की हैं।हिमाचल से निकलने वाली नदी की मुख्‍य प्रणाली सिंधु और गंगा ब्रहमपुत्र मेघना नदी की प्रणाली की तरह है। सिंधु नदी, जो विश्‍व की महान, नदियों में एक है, तिब्‍बत में मानसरोवर के निकट से निकलती है और भारत से होकर बहती है और तत्‍पश्‍चात् पाकिस्‍तान से हो कर और अंतत: कराची के निकट अरब सागर में मिल जाती है। 


भारतीय क्षेत्र में बहने वाली इसकी सहायक नदियों में सतलुज (तिब्‍बत से निकलती है), व्‍यास, रावी, चेनाब, और झेलम है। गंगा-ब्रह्मपुत्र मेघना एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण प्रणाली है जिसका उप द्रोणी क्षेत्र भागीरथी और अलकनंदा में हैं, जो देवप्रयाग में मिलकर गंगा बन जाती है। यह उत्‍तरांचल, उत्‍तर प्रदेश, बिहार और प.बंगाल से होकर बहती है। राजमहल की पहाडियों के नीचे भागीरथी नदी,जो पुराने समय में मुख्‍य नदी हुआ करती थी, निकलती है जबकि पद्भा पूरब की ओर बहती है और बांग्‍लादेश में प्रवेश करती है। यमुना, रामगंगा, घाघरा, गंडक, कोसी, महानदी, और सोन गंगा की महत्‍वपूर्ण सहायक नदियाँ है। चंबल और बेतवा महत्‍वपूर्ण उप सहायक नदियाँ हैं जो गंगा से मिलने से पहले यमुना में मिल जाती हैं। पद्मा और ब्रह्मपुत्र बांग्‍लादेश में मिलती है और पद्मा अथवा गंगा के रुप में बहती रहती है। ब्रह्मपुत्र तिब्‍बत से निकलती है, जहाँ इसे सांगणो कहा जाता है और भारत में अरुणाचल प्रदेश तक प्रवेश करने तथा यह काफी लंबी दूरी तय करती है, यहाँ इसे दिहांग कहा जाता है। पासी घाट के निकट देबांग और लोहित ब्रह्मपुत्र नदी से मिल जाती है और यह संयुक्‍त नदी पूरे असम से होकर एक संकीर्ण घाटी में बहती है। यह घुबरी के अनुप्रवाह में बांग्‍लादेश में प्रवेश करती है। 



भारत में ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियाँ सुबसिरी, जिया भरेली, घनसिरी, पुथिभारी, पागलादिया और मानस हैं। बांग्‍लादेश में ब्रह्मपुत्र तिस्‍त आदि के प्रवाह में मिल जाती है और अंतत: गंगा में मिल जाती है। मेघना की मुख्‍य नदी बराक नदी मणिपुर की पहाडियों में से निकलती है। इसकी महत्‍वपूर्ण सहायक नदियाँ मक्‍कू, ट्रांग, तुईवई, जिरी, सोनई, रुक्‍वी, कचरवल, घालरेवरी, लांगाचिनी, महुवा और जातिंगा हैं। बराक नदी बांग्‍लादेश में भैरव बाजार के निकट गंगा-‍ब्रह्मपुत्र के मिलने तक बहती रहती है। 



दक्‍कन क्षेत्र में अधिकांश नदी प्रणालियाँ सामान्‍यत पूर्व दिशा में बहती हैं और बंगाल की खाड़ी में मिल जाती हैं। 



गोदावरी, कृष्‍णा, कावेरी, महानदी, आदि पूर्व की ओर बहने वाली प्रमुख नदियाँ हैं और नर्मदा, ताप्‍ती पश्चिम की बहने वाली प्रमुख नदियाँ है। दक्षिणी प्रायद्वीप में गोदावरी का दूसरी सबसे बड़ी नदी का द्रोणी क्षेत्र है जो भारत के क्षेत्र 10 प्रतिशत भाग है। इसके बाद कृष्‍णा नदी के द्रोणी क्षेत्र का स्‍थान है जबकि महानदी का तीसरा स्‍थान है। डेक्‍कन के ऊपरी भूभाग में नर्मदा का द्रोणी क्षेत्र है, यह अरब सागर की ओर बहती है, बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं दक्षिण में कावेरी के समान आकार की है और परन्‍तु इसकी विशेषताएँ और बनावट अलग है। 



कई प्रकार की तटवर्ती नदियाँ हैं जो अपेक्षाकृत छोटी हैं। ऐसी नदियों में काफी कम नदियाँ-पूर्वी तट के डेल्‍टा के निकट समुद्र में मिलती है, जबकि पश्चिम तट पर ऐसी 600 नदियाँ है। 



राजस्‍थान में ऐसी कुछ नदियाँ है जो समुद्र में नहीं मिलती हैं। ये खारे झीलों में मिल जाती है और रेत में समाप्‍त हो जाती हैं जिसकी समुद्र में कोई निकासी नहीं होती है। इसके अतिरिक्‍त कुछ मरुस्‍थल की नदियाँ होती है जो कुछ दूरी तक बहती हैं और मरुस्‍थल में लुप्‍त हो जाती है। ऐसी नदियों में लुनी और मच्‍छ, स्‍पेन, सरस्‍वती, बानस और घग्‍गर जैसी अन्‍य नदियाँ हैं। 


सरस्वती नदी व प्राचीनतम सभ्यता

आज सिंधु घाटी की सभ्यता प्राचीनतम सभ्यता जानी जाती है। नाम के कारण इसके शोध की दिशा बदल गयी। वास्तव में यह सभ्यता एक बहुत बड़ी सभ्यता का अंश है, जिसके अवशिष्ट चिन्ह उत्तर में हिमालय की तलहटी (मांडा) से लेकर नर्मदा और ताप्ती नदियों तक और उत्तर प्रदेश में कौशाम्बी से गांधार (बलूचिस्तान) तक मिले हैं। अनुमानत: यह पूरे उत्तरी भारत में थी। यदि इसे किसी नदी की सभ्यता ही कहना हो तो यह उत्तरी भारत की नदियों की सभ्यता है। इसे कुछ विद्वान उनके बीच उस समय प्रवाहित प्राचीन सरस्वती नदी की सभ्यता करते हैं। यह नदी प्राचीन काल में शिवालिक पहाड़ियों से निकल कर पूर्व में गंगा-यमुना का क्षेत्र और पश्चिम में सतलुज-सिंधु के क्षेत्र के बीच बहकर राजस्थान को सिंचित करती थी, जहाँ आज घग्घर का सूखा ताल है, और कच्छ के रन में ( जो उसी का बचा भाग कहा जाता है) सागर से मिलती थी। कालांतर में बदलती जलवायु और राजस्थान की ऊपर उठती भूमि के कारण यह सूख गयी। इसका जल यमुना ने खींच लिया।

इस सभ्यता का क्षेत्र संसार की सभी प्राचीन सभ्यताओं के क्षेत्र से अनेक गुना बड़ा और विशाल था। अन्य सभी का कार्यक्षेत्र तुलना में बहुत छोटा- सुमेर और फिर बाबुल (Babylonia) दजला (संस्कृत : दृषद्वती) और फरात नदियों के बीच की घाटी में, हित्ती सभ्यता अनातोलिया के कुछ भाग में, प्राचीन यहूदी सभ्यता पुलस्तिन् (Palestine) की छोटी घाटी के आसपास, यूनान, क्रीट तथा रोम की सभ्यताएँ उनके छोटे क्षेत्रों में, मिस्त्र की प्राचीन सभ्यता नील नदी के उत्तरी भाग में, ईरान और हखामशी सभ्यता ईरान के कुछ भागों में और मंगोल एवं चीनी सभ्यताएँ ( जो उक्त सभ्यताओं की तुलना में आधुनिक थीं) के उस समय के घेरे भी सैंधव सभ्यता (आगे इसे सारस्वत सभ्यता कहेंगे) के क्षेत्र से बहुत छोटे थे। यह भी महत्वपूर्ण है कि यदि कोई मानव सभ्यता का आदि देश होगा तो उसके अवशिष्ट चिन्ह किसी विस्तृत क्षेत्र में फैले होने की संभावना है। 

अधिकांश प्राचीन सभ्यताएँ किसी साम्राज्य के सहारे बढ़ीं। इसीलिए अनेक पुरातत्वज्ञ सभ्यता और साम्राज्य दोनों का एक साथ विचार करते हैं। पर सारस्वत सभ्यता किसी साम्राज्य के साये में नहीं पली। वह युद्घ से, शिरस्त्राण एवं कवच से अपरिचित प्रतीत होती है। जो भी अस्त्र-शस्त्र थे वे साधारण थे तथा इनके विकसित या उन्नत रूप नगरों में भी उपलब्ध न थे। यहाँ तक कि शिकार के चित्र एवं दृश्य इनके नगर-गृहों में तथा भित्तियों पर नहीं मिलते। ऎसा लगता है कि सहस्त्राब्दियों से जिन्हें किसी आक्रमण का भय न था और युद्घ से सामना न पड़ा, जिन्होंने सुदीर्घ काल तक शांति-सुख भोगा उनके बीच उपजी तथा पनपी यह सभ्यता। इसी से प्रारंभ में पुरातत्वज्ञों ने इसे 'सिंधु घाटी का रहस्यमय साम्राज्य ' की संज्ञा दी। वे साम्राज्स से विलग कर किसी सभ्यता का विचार न कर सके।

इतिहासज्ञ कहते हैं कि संघर्ष और युद्घ के बीच विज्ञापन का विकास होता है। उनमें होता है विनाशकारी अस्त्र-शस्त्रों का एवं बचाव के साधनों का आविष्कार; और नए साम्राज्यों का निर्माण, जिनमें नयी सभ्यताएँ बनती-बिगड़ती हैं। ऎसा ही दृश्य आज का इतिहास प्रस्तुत करता है। इसलिए कौन आश्चर्य कि जब वे इस शांतिकाल की संस्कृति के संपर्क में आए तो उसके विस्तार ने, उसकी एकरूपता ने (जिसमें न भौगोलिक दूरी और न समय की गति चोट पहुँचा सकी) और जिसे उन्होंने 'सभ्यता की धीमी प्रगति' कहा (अर्थात शीघ्र बदल या विकास के लक्षणों का अभाव), उसने उन्हें चकित कर दिया। 'मुइन-जो-दड़ो' ('मृतकों की डीह') नगर का कम-से-कम सात बार निर्माण हुआ कहते हैं, पर प्रारंभ तथा अंत के निर्माण में अंतर नहीं दिखता। इसे देखकर उन्होंने कहना प्रारंभ किया कि जैसे बाबुल की साम्राज्यवादी सभ्यता का एक क्रमिक विकास दृष्टिगोचर होता है वैसा न होने के कारण सारस्वत सभ्यता किसी सैद्घांतिक विस्फोट (ideological explosion) का सुफल था। वे भूलते हैं कि दीर्घ शांतिकाल में ही दर्शन, विज्ञान और कलाएँ विकसित होती हैं। यह भारत की प्रकृति को दृष्टि से ओझल करना है, जिसने दीर्घकालीन शांति एवं समृद्घि देखी; जहाँ की सभ्यता किसी साम्राज्य की देन नहीं, किंतु सभ्यता की देन एक सांस्कृतिक साम्राज्य था। इसी कारण आर्य और अन्य जातियों के मध्य एक काल्पनिक संघर्ष की बात गढ़नी पड़ी।

श्री बालसुब्रमण्यम, एवं श्री पीएन बालसुब्रमण्यम जी ने टिप्पणी पर कुछ प्रश्न पूछे हैं। उन्हीं के बारे में,
आज जिसे 'सिन्धु घाटी की सभ्यता' कहते हैं, वह तो सारस्वत सभ्यता के अन्त की कहानी है। सारस्वत सभ्यता इसके पूर्व की है, जो तटीय पृथ्वी को ऊँची उठने के कारण उसे पश्चिम सिन्धु नदी की ओर जाना पड़ा। किवदन्ती है कि त्रेता युग अर्थात बड़ा युग (राम का युग) पहले आया और द्वापर (कृष्ण का युग) बाद में। अर्थात अयोध्या व गंगा का मैदान पुराना है, और पश्चिम में द्वारिका जो प्राचीन काल में सिन्धु घाटी के पूर्व मुहाने के बगल में थी बाद में।

ऋग्वेद का युग, सिन्धु घाटी की सभ्यता से पुराना है ही पर काल निश्चित करने का केवल एक ही विश्वस्त तरीका है। वह है उस घटना के बारे में वर्णित खगोलीय जानकारी। अब इस दिशा में कार्य प्रारम्भ हुआ है। (देखें डेटिंग दि इरा आफ राम-पुष्कर भटनागर) खगोलीय घटनाएँ भी अपने काल अथवा युग में दुहराती है, इसलिए अन्य साक्ष्य से देखना पड़ेगा कि यह घटना उसके पहिले वाले युग की तो नहीं है। इसमें किवदन्तियां सहायक होती है। संम्भवतः ऋग्वेद का युग जैसा डा० राम विलास शर्मा ने लिखा, उसके पहले का हो।

'जल प्रलय' की घटना। 'ग्लेशियल एज' की बर्फ पिघलने से जल-स्तर बढ़ा। उसकी एक व्याख्या मैंने अपनी पुस्तक 'कालचक्र: सभ्यता की कहानी' के अध्याय 'सम्यता की प्रथम किरणें एवं दन्तकथाएं' में यहां दी है। सम्भवतया यह भूमध्यसागर बनने की कहानी है। ऋग्वेद में उसका वर्णन न होना कोई अनहोनी बात नहीं। हम जागलिक परिप्रेक्ष्य में घटनाओं को देखें।


ओजोन परत


सूर्य का प्रकाश ओजोन परत से छनकर ही पृथ्वी पर पहुंचता हैं। यह खतरनाक पराबैंगनी विकिरण को पृथ्वी की सतह पर पहुंचने से रोकती है और इससे हमारे ग्रह पर जीवन सुरक्षित रहता है। ओजोन परत के क्षय के मुद्दे पर पहली बार 1976 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की प्रशासनिक परिषद (यूएनईपी) में विचार-विमर्श किया गया। ओजोन परत पर विशेषज्ञों की बैठक 1977 में आयोजित की गई। जिसके बाद ‘यूएनईपी’ और विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने समय-समय पर ओजोन परत में होने वाले क्षय को जानने के लिए ओजोन परत समन्वय समिति (सीसीओएल) का गठन किया।

ओजोन-क्षय विषयों से निबटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समझौते हेतु अंतर-सरकारी बातचीत 1981 में प्रारंभ हुई और मार्च, 1985 में ओजोन परत के बचाव के लिए वियना सम्मेलन के रूप में समाप्त हुई। 1985 के वियना सम्मेलन ने इससे संबंधित अनुसंधान पर अंतर-सरकारी सहयोग, ओजोन परत के सुव्यवस्थित तरीके से निरीक्षण, सीएफसी उत्पादन की निगरानी और सूचनाओं के आदान-प्रदान जैसे मुद्दों को प्रोत्साहित किया। सम्मेलन के अनुसार मानव स्वास्थ्य और ओजोन परत में परिवर्तन करने वाली मानवीय गतिविधियों के विरूद्ध वातावरण बनाने जैसे आम उपायों को अपनाने पर देशों ने प्रतिबद्धता व्यक्त की। वियना सम्मेलन एक ढाँचागत समझौता है और इसमें नियंत्रण अथवा लक्ष्यों के लिए कानूनी बाध्यता नहीं है।

ओजोन परत को कम करने वाले विषयों पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को सितम्बर, 1987 में स्वीकार किया गया। ओजोन परत के क्षय को रोकने वाले, ओजोन अनुकूल उत्पादों और जागरूकता जगाने के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल विषयों के कार्यान्वयन के महत्व का उल्लेख करते हुए ओजोन परत के संरक्षण के लिए 16 सितम्बर को अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित किया गया। सभी सदस्य देशों को इस विशेष दिवस पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों और इसके संशोधन के साथ राष्ट्रीय स्तर पर ठोस गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

सरकारें जब तक प्रोटोकॉल के साथ-साथ संशोधनों की अभिपुष्टि नहीं करती तब तक इससे कानूनी रूप से नहीं बंधती हैं। दुर्भाग्य से अनेक सरकारों ने प्रोटोकॉल की अभिपुष्टि तो की है मगर संशोधन और उनके कड़े नियंत्रण उपाय लक्ष्य से पीछे हैं। ओजोन समझौतों पर आज तक 193 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं।

1985 के अंत में दक्षिण ध्रुव (एंटार्कटिक) के ऊपर ओजोन की परत में छेद का पता चलने के बाद सरकारों ने क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी-11, 12, 113, 114 और 115) और अनेक हैलॅन्स (1211, 1301, 2402) के उत्पादन और खपत को कम करने के कड़े उपायों की आवश्यकता को पहचाना। प्रोटोकॉल इस तरह से तैयार किया गया है ताकि समय-समय पर वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी आंकलनों के आधार पर इस प्रकार की गैसों से निजात पाने के लिये इसमें संशोधन किया जा सके। इस प्रकार के आंकलनों के बाद इस प्रकार की गैसों से छुटकारा पाने की प्रक्रिया को तेज करने के लिये 1990 में लंदन, 1992 में कोपेनहेगन, 1995 में वियना, 1997 में मॉन्ट्रियल और 1999 में पेचिंग में चरणबद्ध बहिष्करण में तेजी लाने के लिए प्रोटोकॉल को समायोजित किया गया। अन्य प्रकार के नियंत्रण उपायों को शुरू करने और इस सूची में नये नियंत्रण तत्वों को जोड़ने के लिये भी इसमें संशोधन किया गया।

1990 में लंदन संशोधन के तहत अतिरिक्त क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी-13, 111, 112, 211, 212, 213, 214, 215, 216, 217) और दो विलायक (सॉल्वेंट) (कार्बन टेट्राक्लोराइट और मिथाइल क्लोरोफार्म) को शामिल किया गया जबकि 1992 में कोपेनहेगन संशोधन के तहत मिथाइल ब्रोमाइड, एचबीएफसी और एचसीएफसी को जोड़ा गया। 1997 में मॉन्ट्रियल संशोधन को अंतिम रूप दिया गया जिसके तहत मिथाइल ब्रोमाइड से निजात पाने की योजना बनायी गयी। 1999 में पेचिंग संशोधन के तहत ब्रोमोक्लोरोमिथेन के उपयोग से तुरंत छुटकारा पाने (चरणबद्ध ढंग से बाहर करने) के लिये इसे शामिल किया गया। इस संशोधन के तहत एचसीएफसी के उत्पादन पर नियंत्रण के साथ-साथ गैर-पक्षों के साथ इसके कारोबार पर लगाम लगाने की योजना भी बनाई गई।

ओजोन परतः ओजोन के अणुओं (ओ-3) में ऑक्सीजन के तीन परमाणु होते हैं। यह जहरीली गैस है और वातावरण में बहुत दुर्लभ है। प्रत्येक 10 मिलियन अणुओं में इसके सिर्फ 3 अणु पाये जाते हैं। 90 प्रतिशत ओजोन वातावरण के ऊपरी हिस्से या समताप मंडल (स्ट्राटोस्फेयर) में पाई जाती है जो पृथ्वी से 10 और 50 किलोमीटर (6 से 30 मील) ऊपर है। क्षोभमंडल (ट्रोपोस्फेयर) की तली में जमीनी स्तर पर ओजोन हानिकारक प्रदूषक है जो ऑटोमोबाइल अपकर्षण और अन्य स्रोतों से पैदा होती है।

ओजोन की परत सूर्य से आने वाले ज्यादातर हानिकारक पराबैंगनी- बी विकिरण को अवशोषित करती है। यह घातक पराबैंगनी (यूवी- सी) विकिरण को पूरी तरह रोक देती है। इस प्रकार ओजोन का सुरक्षा कवच हमारे जीवन के लिये बहुत जरूरी है और यह हम जानते हैं। ओजोन की परत की क्षति से पराबैंगनी विकिरण अधिक मात्रा में धरती तक पहुंचता है। अधिक पराबैंगनी विकिरण का मतलब है और अधिक मैलेनुमा और नॉनमैलेनुमा त्वचा कैंसर, आँखों का मोतियाबिंद अधिक होना, पाचन तंत्र में कमजोरी, पौधों की उपज घटना, समुद्रीय पारितंत्र में क्षति और मत्स्य उत्पादन में कमी।

1970 में जब प्रोफेसर पाल क्रुटजन ने ये संकेत दिया कि उर्वरकों और सुपरसोनिक एयरक्रॉफ्ट से निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड से ओजोन की परत को नुकसान होने की आशंका है तो इसके बारे में वैज्ञानिक चिंतित हुए। 1974 में प्रोफेसर एफ शेरवुड रॉलेंड और मारियो जे मोलिना ने यह पता लगाया कि क्लोरोफ्लोरोकार्बन वातावरण में विभाजित होकर क्लोरीन के परमाणु जारी करते हैं और वे ओजोन क्षय का कारण बनते हैं। हेलेन्स के जरिए जारी होने वाले ब्रोमीन परमाणु भी ऐसा ही बुरा प्रभाव डालते हैं। इन तीन वैज्ञानिकों ने अपने महत्वपूर्ण कार्य के लिए 1995 में रसायन विज्ञान में नोबल पुरस्कार प्राप्त किया।

1980 के दशक के प्रारंभ में जब से इसका मापन शुरू हुआ तब से दक्षिण ध्रुव के ऊपर ओजोन की परत स्थिर रूप से कमजोर हो रही है। बेहद ठंडे वातावरण और ध्रुवीय समताप मंडलीय बादलों के कारण भूमंडल के इस भाग पर समस्या और गंभीर है। ओजोन की परत में क्षय वाला भू-क्षेत्र स्थिर रूप से बढ़ रहा है। यह 1990 के दशक में 20 मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक हो गया और उसके बाद यह 20 और 29 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैल गया। उत्तरी ध्रुव के ऊपर ओजोन की परत 30 प्रतिशत जबकि यूरोप और अन्य उच्च अक्षांश वाले क्षेत्रों में ओजोन की परत में क्षय की दर 5 प्रतिशत से 30 प्रतिशत के बीच है।

रसायन और उनसे छुटकारा पाने का कार्यक्रम


मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत फिलहाल 96 रसायनों पर नियंत्रण लगाया गया है जिसमें शामिल हैं-

हेलो कार्बन जो क्लोरोफ्लोरोकार्बन और हेलॅन्स के रूप में उल्लेखनीय है। 1928 में क्लोरोफ्लोरो कार्बन की खोज हुई और इन्हें आश्चर्यजनक गैस माना गया, क्योंकि ये लम्बे समय तक रहती है, और विषैली नहीं होती हैं। इनसे जंग नहीं लगता (असंक्षारक) और ये अज्वलनशील होती हैं। ये परिवर्तनशील है और 1960 के दशक से रेफ्रिजरेटरों, एयरकंडीशनरों, स्प्रे केंस, विलायकों, फोम और अन्य अनुप्रयोगों में इनका उपयोग बढ़ता जा रहा है। सीएफसी-11 पचास वर्षों तक वायुमंडल में रहती है, सीएफसी-12 एक सौ दो वर्षों तक और सीएफसी-115 सत्रह सौ वर्षों तक वायुमंडल में रहती है। हेलॅन-1301 प्राथमिक रूप से आग बुझाने में उपयोग की जाती है और यह वायुमंडल में 65 साल तक रहती है।

कार्बन टेट्राक्लोराइड विलायक के रूप में उपयोग की जाती है और वायुमंडल में विघटित होने में करीब 42 वर्ष लेती है। मिथाइल क्लोरोफोर्म (1,1,1-ट्राईक्लोरोइथेन) भी विलायक के रूप में इस्तेमाल की जाती है और विघटित होने में करीब 5.4 वर्ष लेती है। हाइड्रोब्रोमोफ्लोरोकार्बन (एचबीएफसी) का अधिक इस्तेमाल नहीं किया जाता है, परंतु किसी नये इस्तेमाल से बचने के लिए इनको भी प्रोटोकॉल के तहत शामिल किया गया है।

हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (एचसीएफसी) सीएफसी के स्थान पर प्रयुक्त करने के लिए पहले प्रमुख विस्थापक के रूप में इसका विकास किया गया था। यह क्लोरोफ्लोरोकार्बन की तुलना में बहुत कम विनाशक है। एचसीएफसी भी ओजोन की क्षय में योगदान देती है और वायुमंडल में करीब 1.4 से 19.5 वर्ष तक विद्यमान रहती है।

मिथाइल ब्रोमोइड (सीएच-3 बीआर) बहुमूल्य फसलों, कीट नियत्रंण और निर्यात के लिये प्रतीक्षित कृषि जिंसों के क्वेरेन्टाइन उपचार के लिये धूम्रक (फ्यूमिगैन्ट) के रूप में इस्तेमाल की जाती है। वायुमंडल में विघटित होने में इसे करीब 0.7 वर्ष लगते हैं।

ब्रोमोक्लोरोमीथेन (बीसीएम) ओजोन को क्षति पहुंचाने वाला नया तत्व है जिसे कुछ कम्पनियों ने 1998 में बाजार में उतारने की अनुमति मांगी थी। इसको इस्तेमाल से बाहर करने के लिये 1999 के संशोधन में शामिल किया गया।

भारत को चार प्रमुख रसायन-क्लोरोफ्लोरा कार्बन, सीटीसी, हेलॅन्स और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन इस्तेमाल से बाहर करने थे जिनमें से 2003 के प्रारंभ में हेलेन्स को इस्तेमाल से बाहर किया गया। 1 अगस्त 2008 तक सीएफसी को भी इस्तेमाल से बाहर कर दिया गया है। सीटीसी का इस्तेमाल 2009 के आखिर तक बंद करने की बात थी और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन को बाहर करने की प्रक्रिया अभी जारी है। सभी पक्ष ओजोन को क्षति पहुंचाने वाले ऐसे नये तत्वों के विपणन से बचने के उपायों पर विचार कर रहे हैं जो अब तक प्रोटोकॉल में शामिल नहीं है।

विकसित देशों में हेलॅन्स और क्लोरोफ्लोरोकार्बन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, मिथाइल क्लोरोफार्म और हाइड्रोब्रोमोफ्लोरोकार्बन को इस्तेमाल से बाहर करने की प्रक्रिया क्रमश: 1994 और 1996 में पूरी कर ली गई है 1999 तक मिथाइलब्रोमोइड के इस्तेमाल में 25 प्रतिशत कमी की गयी। 2001 में 50 प्रतिशत और 2003 में 70 प्रतिशत कमी की गई। 2005 तक इसे इस्तेमाल से पूरी तरह बाहर कर दिया गया।

इस दौरान 2004 तक हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन के इस्तेमाल में 35 प्रतिशत कमी की गई जिसके इस्तेमाल में 2010 तक 65 प्रतिशत, 2015 तक 90 प्रतिशत और 2020 तक 99.5 प्रतिशत कमी की जानी है। 2030 तक सिर्फ रख-रखाव के उद्देश्यों में ही इसके 0.5 प्रतिशत इस्तेमाल की अनुमति होगी। 1996 तक हाइड्रोब्रोमोफ्लोरोकार्बन और बीसीएम को तुरंत इस्तेमाल से बाहर करने का कार्यक्रम बनाया गया। विकासशील देशों को इन गैसों को इस्तेमाल से बाहर करने का कार्यक्रम शुरू करने से पहले कुछ समय की छूट दी गई। इससे इस बात का पता चलता है कि विकसित देश वायुमंडल में कुल उत्सर्जन के अधिकांश के लिए उत्तरदायी है और उनके पास इनके विस्थापकों को अपनाने के लिये अधिक वित्तीय और प्रौद्योगिकी संसाधन है। विकासशील देशों का कार्यक्रम इस प्रकार था-

• 1996 तक हाइड्रोब्रोमोफ्लोरोकार्बन और बीसीएम को तुरंत इस्तेमाल से बाहर करना।
• क्लोरोफ्लोरोकार्बन, हेलेन्स और कार्बनटेट्राक्लोरोइड को 1 जुलाई 1999 तक 1995 से 97 के औसत पर लाना, 2005 तक 50 प्रतिशत कमी, 2007 तक 85 प्रतिशत कमी और 2010 तक पूरी तरह इस्तेमाल से बाहर करना।
• 2003 तक मिथाइल क्लोरोफार्म के इस्तेमाल को 1998-2000 के औसत स्तर पर लाना, 2005 तक 30 प्रतिशत कमी और 2010 तक 70 प्रतिशत कमी और 2015 तक पूरी तरह इस्तेमाल से बाहर करना।
• मिथाइलब्रोमोइड के इस्तेमाल को 2002 तक 1995 से 98 के औसत स्तर पर लाना, 2005 तक इस्तेमाल में 20 प्रतिशत कमी और 2015 तक इस्तेमाल से पूरी तरह बाहर करना।
• 2016 तक हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन को 2015 के स्तर पर और 2040 तक इस्तेमाल से बाहर करना।

इस्तेमाल से बाहर करने के कार्यक्रम में लक्षित पदार्थों के उत्पादन और खपत दोनों शामिल है। हालांकि इसके बाद भी विकसित और विकासशील देशों में लक्षित पदार्थों के आवश्यक इस्तेमाल को पूरा करने के लिए सीमित मात्रा में इनके उत्पादन की अनुमति है जिसके लिए अब तक किसी विकल्प की पहचान नहीं की गई है! 

प्रोटोकॉल के बिना, वर्ष 2050 तक ओजोन का अवक्षय उत्तरी गोलार्ध के मध्य अक्षांश में कम से कम 50% और दक्षिणी मध्य अक्षांश में 70% बढ़ जाएगा जो मौजूदा स्तर से 10 गुणा अधिक बुरा होगा। इसका परिणाम उत्तरी मध्य अक्षांश में धरती पर दुगुनी तथा दक्षिण में चौगुनी अल्ट्रावायलेट-बी (पराबैंगनी) विकिरण के रूप में दिखाई देगा। वायुमंडल में ओजोन के अवक्षय के लिए जिम्मेदार रसायनों की मात्रा पांच गुना अधिक होगी। इसके निहितार्थ और भी डरावने यानी नॉन-मैलेनोमा कैंसर के 19 मिलियन अधिक मामले, मैलेनोमा कैंसर के 1.5 मिलियन मामले और आंख के मोतियाबिंद के 130 मिलियन अधिक मामलों के रूप में सामने आएंगे।

विश्व समुदाय ने ओजोन के अवक्षय, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और अंतर्राष्ट्रीय पानी जैसी चुनौतियों से निपटने में विकासशील देशों की मदद करने के लिए वैश्विक पर्यावरण सुविधा (जीईएफ) की स्थापना की थी। जीईएफ परिवर्तनशील अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में ओजोन के अवक्षय के लिए जिम्मेदार पदार्थों को इस्तेमाल से बाहर करने की परियोजनाओं और क्रियाकलापों को बढ़ावा देती है! जीईएफ ने इन परियोजनाओं और कार्यकलापों के अंतर्गत 1996 और 2000 के बीच निम्नलिखित 17 देशों की सहायता के लिए 160 मिलियन डालर से अधिक की मंजूरी दी है।

अज़रबैजान, बेलारूस, बुलगारिया, चैक गणराज्य, इस्टोनिया, हंगरी, कज़ाख्स्तान, लातविया, लिथुआनिया, पोलैण्ड, रूसी संघ, स्लोवाकिया, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, यूक्रेन और उज्बेकिस्तान। जीईएफ ने हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन और मिथाइल ब्रोमाइड को इस्तेमाल से बाहर करने में इन देशों की मदद करने के लिए 60 मिलियन डालर का अतिरिक्त कोष चिह्नित किया है।

वैज्ञानिकों ने अनुमान व्यक्त किया है कि अगले पांच वर्षों के दौरान ओजोन क्षय अपने सबसे बुरे स्तर पर पहुंच जाएगा और फिर धीरे-धीरे इसमें विपरीत रूझान आना शुरू होगा एवं करीब 2050 तक ओजोन परत सामान्य स्तर पर आ जाएगी। यह अनुमान इस आधार पर व्यक्त किया गया है कि माँट्रियल प्रोटोकोल को पूरी तरह लागू किया जाएगा। ओजोन परत फिलहाल बेहद संवेदनशील अवस्था में है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन उत्सर्जन में कमी के बावजूद, समतापमंडलीय सांद्रण अब भी बढ़ रहा है (तथापि निचले वायुमंडल में वे कम हो रहे हैं) क्योंकि लम्बे समय तक बने रहने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन का जो उत्सर्जन हो चुका है वह समताप मंडल में अब भी बढ़ना जारी है। कुछ निश्चित क्लोरोफ्लोरोकार्बन (जैसे सीएफसी-11 और सीएफसी-113), कार्बन टेट्राक्लोराइड और मिथाइल क्लोरोफार्म की प्रचुरता घट रही है। ज्यादातर हैलॅन्स की प्रचुरता में वृद्धि जारी है। वस्तुतः हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन और हाइड्रोफ्लोरोकार्बन बढ़ रहे हैं, क्योंकि वे क्लोरोफ्लोरोकार्बन (जो इस्तेमाल से बाहर किए जा रहे हैं) के विकल्पों के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ओजोन सुरक्षा की सफलता संभव हुई है क्योंकि विज्ञान और उद्योग ओजोन का क्षय करने वाले रसायनों के विकल्पों को विकसित करने और उनका व्यावसायीकरण करने में सफल रहे हैं।

सितंबर माह की 16 तारीख को सारी दुनिया में 21वां विश्व ओजोन दिवस मनाया गया। वर्ष 2008 का विषय ‘माँट्रियल प्रोटोकॉल - वैश्विक लाभों के लिए अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी’ है। राष्ट्रों के बीच ओजोन परत को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर विचार-विमर्श किया गया। माँट्रियल प्रोटोकोल अनेक सबक उपलब्ध कराता है जो पर्यावरण से जुड़े अन्य वैश्विक मुद्दों को हल करने के लिए इस्तेमाल किए जाएंगेः

• एहतियाती मार्ग का पालन करना क्योंकि सम्पूर्ण वैज्ञानिक प्रमाण का इंतजार करने से उस हद तक कार्य करने में देरी हो सकती है जहां नुकसान उस स्तर पर पहुंच जाएगा जिसे पूरा करना संभव नहीं होगा।
• उद्योगों को निरंतर विश्वसनीय संकेत देना (अर्थात कानूनन बाध्य चरणबद्ध बहिष्करण कार्यक्रम को अपनाने के जरिए) ताकि उनको नई और कम खर्च वाली प्रौद्योगिकी के रूप में विकल्प का विकास करने के लिए छूट मिले।
• यह सुनिश्चित करना कि परिष्कृत वैज्ञानिक समझ को जल्दी से जल्दी संधि के प्रावधानों के बारे में फैसला लेने में शामिल किया जा सके।
• विकासशील और विकसित देशों की सामान्य मगर विशिष्ट जिम्मेदारी को पहचान कर सामूहिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना और विकासशील देशों को जरूरी वित्तीय और प्रौद्योगिकीय सहायता सुनिश्चित करना।
• नियंत्रण उपाय विज्ञान, अर्थशास्त्र और प्रौद्योगिकी के एकीकृत आकलन पर आधारित होने चाहिए।

प्रगतिशील वनविनाश


Author: 
 सोशल वॉच की रिपोर्ट
थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क फिचर्स
तंजानिया में वर्ष 1990 एवं 2005 के मध्य वन क्षेत्र में 15 प्रतिशत की कमी आई है और बढ़ती गरीबी के चलते लकड़ी का उपयोग भी बढ़ा है। वहीं सेनेगल और सोमालिया में स्थानीय एवं निर्यात के लिए कोयला बनाने की वजह से वनों का बड़े पैमाने पर विनाश हो रहा है। यही स्थिति सूडान की भी है। द सोशल वॉच 2011 की मलेशिया की राष्ट्रीय रिपोर्ट इस खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा कर रही है कि स्थानीय समुदाय वनों के विनाश से न केवल अपनी जीविका ही खो रहा है बल्कि वनों की विलुप्ति के साथ उसकी पारम्परिक जीवनशैली एवं संस्कृति भी विलुप्त हो रही है।
विश्व आर्थिक संकट की ही तरह वन विनाश के भी कई कारण सामने आ रहे हैं। इसमें प्रमुख हैं बाजार में मूल उत्पादों और कृषि भूमि की मांग में वृद्धि, गरीबी की बढ़ती समस्या, जलवायु परिवर्तन, पेड़ों का लकड़ी एवं ईंधन के लिए कटना। उपरोक्त निष्कर्ष सोशल वॉच रिपोर्ट - 2012 से सामने आए हैं। पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा के बढ़ते मूल्यों के चलते निर्धनतम वर्ग द्वारा एक बार पुनः लकड़ी एवं कोयले के इस्तेमाल करने की वजह से भी वन संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। लेकिन यह दुष्चक्र जारी है। वनों के विलुप्त होने से हमारे ग्रह की कार्बन सोखने की क्षमता में आई कमी के परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन से निपट पाना भी कठिन होता जा रहा है। कानूनों में व्याप्त ढिलाई के कारण भी समस्या और गहराती जा रही है। रिपोर्ट के यूरोप से संबंधित अध्याय में ‘इंडिजेनाडोय’ में चेतावनी देते हुए बताया गया है कि यूरोपीय संघ की अपने पशुधन के लिए चारे हेतु विदेशों पर निर्भरता ने ‘विदेशों में भूमि की मांग में हुई वृद्धि’ की वजह से विश्व भर में वनों का सामाजिक विनाश सामने आ रहा है।
वैश्विक विकास को लेकर प्राथमिक घोषणापत्र (रियो $ 20 के आगे: न्याय के बिना कोई भविष्य नहीं) में तेजी से फैलते अस्थिर उत्पादन एवं उपभोग की प्रवृत्ति को प्राकृतिक संसाधनों में तेजी से हो रही कमी के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। इसी प्रवृत्ति को वैश्विक तापमान में वृद्धि, अतिवादी मौसम की निरन्तर आवृत्ति, रेगिस्तानीकरण एवं वनों के विनाश के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। रिपोर्ट में फिनलैंड द्वारा किए जा रहे वनों के विनाश का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि ‘वर्तमान में कई मुख्य फिनिश कंपनियां जो कि स्वयं को विश्व की सर्वोच्च कंपनी मानती हैं, के ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जिसमें उनके द्वारा अधिक संख्या में यूकेलिप्टस के लगाए जाने से आबादी का पलायन हुआ है एवं बड़ी मात्रा में भूमि हथियाई गई है।’ रिपोर्ट के अनुसार यहां की कमोवेश राज्य के स्वामित्व वाली कंपनी ‘नेस्ले आईल’ जो कि विश्व में बायो ईंधन में अग्रणी होने को तड़प रही है, ने मुख्यतया मलेशिया, इंडोनेशिया में व्यापक स्तर पर भूमि एवं वर्षा वनों के उपयोग में परिवर्तन कराया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये क्षेत्र निर्विवाद रूप से विश्व में सर्वाधिक कार्बन सोखने का कार्य करते थे। यहां नेस्ले की रिफायनरियों को तेल आपूर्ति हेतु आरक्षित भूमि करीब 7 लाख हेक्टेयर है।

जाम्बिया की स्थिति तो और भी विकट है। पिछले दशक में यहां प्रतिवर्ष औसतन 3 लाख हेक्टेयर वन नष्ट होने का अनुमान था। लेकिन मात्र एक वर्ष 2008 में 8 लाख हेक्टेयर वन कम हुए हैं। वर्ष 1990 एवं 2010 के मध्य देश में वनों के क्षेत्र में 6.3 प्रतिशत या 33 लाख हेक्टेयर की कमी आई है। ब्राजील में भी वनों की कटाई एवं अमेजन वनों में लगी आग कमोवेश ‘कृषि के विस्तार’ का परिणाम ही कही जाएगी। वहीं दूसरी ओर ताकतवर लॉबी के कारण वन नियमावली में परिवर्तन कर अमेजन में पारम्परिक वन का अनुपात 80 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है। पेरु का अमेजन वन क्षेत्र दुनिया का आठवां एवं लेटिन अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा वन क्षेत्र है। पिछले कई दशकों से यहां के वन भी घरों के लिए ईंधन के साथ ही साथ कटाई एवं खेती के लिए वन जलाने हेतु प्रचलित पद्धति के कारण विनाश की ओर अग्रसर हैं। यहां पर मैंग्रोव वनों एवं शुष्क तथा अर्द्ध शुष्क वनों का क्षेत्र प्रतिवर्ष करीब 1,50,000 हेक्टेयर सिकुड़ रहा है।

ग्वाटेमाला में अमीर देशों के लिए गन्ना एवं निकारागुआ में कॉफी की एकल खेती की वजह से भी वनों को हानि पहुंची है। निकारागुआ के कृषि निर्यात मॉडल की वजह से ‘प्रगतिशील वन विनाश’ हुआ है। 1980 के दशक में जब कोको की कीमतों में कमी आई तो सरकार ने उत्पादन में वृद्धि के लिए अपने उष्णकटिबंधीय वनों का और अधिक विनाश किया। ग्वाटेमाला में रस निकालने एवं घरों के लिए ईंधन की वजह से वहां के पारम्परिक वन 80 हजार हेक्टेयर प्रतिवर्ष की दर से कम हो रहे हैं और यदि यही स्थिति बनी रही तो इस देश में वर्ष 2040 तक वनों का नामोनिशान मिट जाएगा।



निकारागुआ में अवैध कटाई, कृषि विस्तार एवं वनों में आग, जो कि अक्सर जानबूझकर फसलों हेतु नई भूमि प्राप्त करने के लिए लगाई जाती है, की वजह से प्रतिवर्ष 75,000 हेक्टेयर वनों का विनाश हो रहा है। यहां के घरों में खाने पकाने का 76 प्रतिशत ईंधन लकड़ियों से प्राप्त होता है। मौजूदा 1.2 करोड़ हेक्टेयर वनों में से 80 लाख हेक्टेयर वन बर्बाद हो चुके हैं। यही स्थिति पनामा की भी है यहां वर्ष 1970 में वन क्षेत्र 70 प्रतिशत था, जो कि वर्ष 2011 में घटकर 35 प्रतिशत ही रह गया है। अर्जेंटीना में वर्ष 1937 से 1987 के मध्य करीब 23553 वर्ग किलोमीटर वन नष्ट हुए वहीं वर्ष 1998 से 2006 के मध्य प्रतिवर्ष करीब 2500 वर्ग किलोमीटर वनों का विनाश हुआ। यानि यहां प्रति दो मिनट में एक हेक्टेयर वन विलुप्त हो जाता है। देश की राष्ट्रीय रिपोर्ट इसके लिए वनों का असंगठित रूप से दोहन, कृषि क्षेत्र के विस्तार, सार्वजनिक नीतियों की कमी एवं पारम्परिक प्रजातियों के पुनः वनीकरण हेतु निजी क्षेत्र को दिए जाने वाले प्रोत्साहन को जिम्मेदार ठहराती है।

म्यांमार (बर्मा) में वन एवं खनन कानूनों का क्रियान्वयन नहीं होता। इसी वजह से वर्ष 1990 एवं 2005 के मध्य यहां पर 25 प्रतिशत वनों का विनाश हुआ लेकिन उसके परिणामों पर कोई विचार ही नहीं करता। फिलीपींस में भी उपरोक्त समस्याएं बड़े पैमाने पर मौजूद हैं, जिसके परिणामस्वरूप वहां का वन क्षेत्र 40 प्रतिशत घटकर 27 प्रतिशत रह गया है। वहीं श्रीलंका तो अपने मूल वनों में से महज 1.5 प्रतिशत वनों को ही सुरक्षित रख पाया है। रिपोर्ट में इसकी वजह ब्रिटिश साम्राज्यकालीन औपनिवेशिक नीतियों को बताया है जिसके तहत रबर, कॉफी एवं चाय के बागान हेतु बड़ी मात्रा में वन काटे गए थे। इतना ही नहीं वर्ष 1990 से 2005 तक चले आंतरिक संघर्षों की वजह से वहां विश्व के प्राथमिक वनों को सर्वाधिक नुकसान पहुंचा और इसकी वजह से बचे हुए वनों का भी 18 प्रतिशत नष्ट हो गया। वर्ष 2004 के बाद नवनिर्माण की पहल के चलते वनों के विनाश में और अधिक तेजी आई है।

मध्य अफ्रीकी गणतंत्रों में खाद्य असुरक्षा (जलवायु परिवर्तन की वजह से) के चलते किसान अपनी खेती का क्षेत्र बढ़ाने हेतु वनों को काट रहे हैं। यहां की 90 प्रतिशत आबादी द्वारा खाना पकाने के लिए लकड़ी के इस्तेमाल की वजह से स्थितियां और भी बदतर हो रही हैं। नाईजीरिया में किसानों के साथ शिकारी भी जल्दी शिकार के लिए वनों को जला रहे हैं। तंजानिया में वर्ष 1990 एवं 2005 के मध्य वन क्षेत्र में 15 प्रतिशत की कमी आई है और बढ़ती गरीबी के चलते लकड़ी का उपयोग भी बढ़ा है। वहीं सेनेगल और सोमालिया में स्थानीय एवं निर्यात के लिए कोयला बनाने की वजह से वनों का बड़े पैमाने पर विनाश हो रहा है। यही स्थिति सूडान की भी है। द सोशल वॉच 2011 की मलेशिया की राष्ट्रीय रिपोर्ट इस खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा कर रही है कि स्थानीय समुदाय वनों के विनाश से न केवल अपनी जीविका ही खो रहा है बल्कि वनों की विलुप्ति के साथ उसकी पारम्परिक जीवनशैली एवं संस्कृति भी विलुप्त हो रही है।