शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

आतंकवाद के कारण व समाधान


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आज पूरी दुनि‍या आतंक के साये में जीने को मजबूर है। समाचार पत्र चरमपंथ और उग्रवाद से संबंधित घटनाओं से भरे रहते हैं।  तथाकथित जिहाद के नाम पर अपनी बात को मनवाने का यह कैसा तरीका है, जिसमें आदमी जान लेने और देने पर तुल हुआ  है! उन्माद का यह कैसा रूप है जहां मानव स्वेच्छा से आत्मघाती बम के रूप में परिवर्तित होकर अपने ही साथियों की जान केवल इस लिए लेना चाहता है कि वे उसके चिंतन के अनुरूप कार्य नहीं करते हैं!  मौजूद लेख में उन सभी कारणों को खोजने और मनोवैज्ञानिक विश्‍लेषण करने का प्रयास किया गया है, जो मनुष्य को आतंक के रास्ते पर ढकेलने के लिए जिम्‍मेदार हैं

आतंकवाद के लिए जिम्‍मेदार पहलू
झुँझलाहट और क्रोध – 
 आतंकवाद के मूल में क्रोध की अतिशयता ही रहती है। जब हमारे मन के मुताबिक व्यवहार हमें नहीं मिलता तो हमें झुँझलाहट होती है। सामान्यतः ऐसा सबके साथ ही होता है और समय के साथ यह झुँझलाहट समाप्त हो जाती है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो इस स्थिति से नहीं निकल पाते। क्रोध और झुँझलाहट उनके मन में इकट्ठे होते रहते हैं। धीरे-धीरे वे एक किस्म के मानसिक रोग का शिकार हो जाते हैं। क्रोध की अग्नि इतनी तीव्र हो जाती है कि वे हर बात का समाधान हिंसा और बल-प्रयोग से ही कर लेना चाहते हैं। अनेक असामाजिक एवं अवांछित तत्व उनकी इसी कमज़ोरी का लाभ उठा कर उन्हें आतंकवाद के दलदल में घसीट लेते हैं
सामाजिक परिवेश का मन पर असर
 कभी-कभी हमें सार्वजनिक रूप से अपमान अथवा अन्यायपूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ता है। गाँधीजी को दक्षिण अफ़्रीका में ऐसी ही परिस्थितियों का सामना अनेक बार करना पडा़ था। उन्होंने तो ऐसी विपरीत परिस्थितियों � @�ें भी �ीरज नहीं खोया। लेकिन हर आदमी गाँधीजी के समान उच्च आदर्श नही प्रस्तुत कर सकता। बहुत से लोग विपरीत एवं अपमानजनक सामाजिक परिस्थितियों में घुटने टेक देते हैं। ऐसी परिस्थितियों के निराकरण के लिए वे हिंसा और आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त हो जाते हैं। दस्यु-बाला फूलनदेवी के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं कि वह डाकू बन बैठी। भारत में नक्सलवाद भी इसी प्रकार का उदाहरण है।
महत्वाकांक्षा –   
  आज हर आदमी एक ही क्षण में करोड़पति बन जाना चाहता है। बिना परिश्रम के सफलता नहीं मिलती। यह बात आधुनिक समय में अधिक महत्व नहीं रखती। जब हम देखते हैं कि अमुक व्यक्ति को किसी फ़िल्म में काम करने का अवसर मिला और वह रातों-रात सड़क से महल में पहुंच गया, तब हम में से कुछ इस बात को पचा नहीं पाते। वे सोचते हैं कि यह अवसर उन्हें भी तो मिल सकता था! पैसों और संसाधनों का असमान वितरण, अवसरों का सबके लिए उपलब्ध न होना आदि त्थय अनेक लोगों को अवांछित गतिविधियों में लिप्त कर देने के लिए पर्याप्त होते हैं। ऐसे लोग आरंभ में शीघ्रता से धन कमाने के लिए अपहरण, जबरन वसूली जैसे गैरकानूनी धंधों का सहारा लेते हैं। धीरे-धीरे ऐसे लोग किसी आतंकवादी संगठन का सहारा लेकर अपनी शक्ति को और अधिक बढा़ने का प्रयत्न करते हैं। डी० कंपनी के लिए काम करने वाले अनेक लोग इसी श्रेणी में आते हैं। यही महत्वाकांक्षा कभी-कभी राजणैतिक रंग भी ले लेती है। महत्वाकांक्षी व्यक्तियों एवं संगठनों को ऊंचे-ऊंचे सपने दिखा कर राजनीति से जुडे़ लोग उनसे अनेक अवांछित कार्य करवाने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार ऐसे लोगों को राजनैतिक संरक्षण मिल जाता है और उनकी शक्ति में व्रिद्धि होती रहती है। महत्वाकांक्षा का नशा बहुत शक्तिशाली होता है। इस नशे के आदी मनुष्य राजसत्ता पर भी कब्जा करना चाहते हैं। इसके लिए वे हथियारों की तस्करी, नशे का कारोबार तथा राजनेताओं को अपनी ओर करने का प्रयत्न करते रहते हैं। अपनी शक्ति में वृद्धि करने के लिए वे मानसिक स्तर पर कमज़ोर लोगों की तलाश में रहते हैं। जहां उन्हें ऐसे लोग दिखाई देते हैं, वे तुरंत उन्हें अपने जाल में फँसा लेते हैं।
महत्वाकांक्षा का राजसी रूप  
जो असिमित महत्वाकांक्षा मनुष्यों में होती है, और उन्हें आतंकवाद के रास्ते पर ले जाती है, वही कभी-कभी सरकारों में भी देखी जाती है। अपने राज्य की उन्नति और पडो़सी राज्य की अवनति के लिए भी आतंकवाद को एक माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। पाकिस्तान की ओर से भारत में आतंकवाद का प्रसार इसी बात का उदाहरण है। पाक सेना आतंकवाद को युद्ध की एक नीति के रूप में प्रयुक्त करती है। कभी धर्म के नाम पर और कभी ऐसे ही किसी और बहाने से, भारत के विरुद्ध लोगों को भड़का कर आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है।
धार्मिक कट्टरपंथ
यद्यपि धर्म मानव के नैतिक विकास का माध्यम है, तथापि कभी-कभी निहित स्वार्थ इसे आतंकवादी तैयार करने के लिए भी प्रयुक्त करते हैं। तथाकथित इस्लामिक जेहाद की दुहाई देकर भोले-भाले धर्म-सहिषणु लोगों को आतंकवाद के रास्ते पर धकेल दिया जाता है।

समाधान -
समझने होंगे धर्म के सही मायने
जो धर्म इंसान के अनुकूल शिक्षा और वातारवरण नहीं दे स‍कता है उसे धर्म नहीं कहा जा है, धर्म कट्टरता का नाम नहीं होता है, धर्म तो श्रेष्टताओं का समुच्‍चय होता हैं, धर्म प्रगतिशीलता का वाहक  कहा जाता है, धर्म का उद्देश्‍य ही यही हैं कि मनुष्‍य को उसके विकास के चरम तक ले जाए, धर्म केवल माध्‍यम हैं लक्ष्‍य नहीं, धर्म का मतलब विवेकहीन, तर्कहीन मान्‍यताओं का कट्टरता के साथ अनुसरण करना नहीं हैं, धर्म में तो विवके को ही सर्वोपरि माना जाना चाहिए  विश्‍व में धर्म के प्रति बन चुकी कट्टर मान्‍यताओं के चंगुल से निकलना होगा, जिसका सबसे बडा जरिया श्रेष्‍ठ शिक्षा ही हो सकती है,
प्रततिशील शिक्षा की आवश्‍कता
आतंकवाद के सफाए के लिए सबसे पहले शिक्षा के क्षेत्र में हमें ऐसे परिवर्तन करने होंगे, जिससे छात्रों का संपूर्ण मानसिक एवं नैतिक उत्थान हो सके। इस प्रकार, वे क्रोध और झुँझलाहट के वशीभूत होकर आतंकवादी नहीं बनेंगे। नैतिक विकास द्वारा वे सही तथा गलत के बीच का अंतर समजेंगे और सही निर्णय लेने में सक्षम होंगे। शिक्षा के प्रचार-प्रसार से सभी मनुष्यों में एक सही समझ पैदा होगी। इससे सीधे-सादे लोगों को बहका-फुसलाकर दहशत फैलाने लिए प्रेरित नहीं किया जा सकेगा।
इसके अलावा  हमें संसाधनों के न्यायपूर्ण एवं समान वितरण पर भी ध्यान देना होगा। समाज एवं प्रशासन का दायित्व है कि वह सनिश्चित करे कि जाति, धर्म, वर्ग अदि के आधार पर कभी किसी को अन्याय और अपमान नहीं  सहना पडे़गा। स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व की भावना के विकास से आतंकवाद का समूल नाश किया जा सकता है।

आशीष कुमार


हाथियारों से लैस अफगानिस्‍तान के अज्ञात स्‍थान पर खडे आतंकवादी

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

पाकिस्तान या आंतकिस्तान

Pakistani terrorism 26/11
 जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के जंगलों में सुरक्षा बलों व पाकिस्तानी  आतंकवादियों के बीच पिछले एक सप्ताह से मुठभेड़ जारी है। नियंत्रण रेखा के नजदीक दो स्थानों पर चल रही मुठभेड़ में सेना के एक मेजर सहित आठ जवान शहीद हुए हैं, ......... जम्मू पुलिस ने सोमवार को होटल से पकड़े गए तीनों आतंकवादियों के बारे में एक बयान में कहा कि यह तीनों आतंकवादी पाकिस्तानी  हैं, और गुलाम फरीद नाम का आतंकवादी तो पाकिस्तानी  फौज का जवान भी है. ये तीनों ही आत्मघाती हमले ...
आए दिन हमें ऐसी खबरों से दो चार होना पङता है, .... पाकिस्‍तान के मामले में अमेरिका भी कई आधिकारिक रूप से बयान जारी करके कह चुका है पाकिस्‍तान विश्‍व में आतंकवाद का प्रमुख केन्‍द्र हैं.... यह  विश्‍व आतंकवाद के लिए एक नर्सरी का काम कर रहा है ....
पेश है, भारत के संबंध में तथ्‍यपरक पहलूओं के साथ एक विशेष फीचर

पाक के प्रमुख आतंकी एवं उग्रवादी संगठन जो पाकिस्तान  में सक्रिय हैं
  • लश्क्र-ए-उमर
  • तहरीक-ए-नफज-ए.शरीयत-ए-मोहम्मदी
  • लश्ककर-ए-जांघवी
  • सिपह-ए-मुहम्मउद पाकिस्तायन (एसएमपी)
  • जमात-उल-फुकरा
  • नदीम कमांडो
  • मुस्लिम यूनाइटेड आर्मी
  • हरकत-उल-मुजाहीदीन अल-आलमी (हुमा)
अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सक्रिय पाक के आतंकी संगठन
  • हिज्बुल मुजाहीदीन (एचएम)- इसका मुख्यालय पका अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में स्थित है
  • लश्कनर-ए-तयैबा (एलईटी)- दक्षिण एशिया के सबसे बड़े और कुख्या‍त इस्लामिक आतंकवादी संगठनों में से एक।  पीओके में इसके कई ट्रेंनिंग कैंप चल रहे हैं। इस आतंकी संगठन ने भारत में कई आतंकी वारदातों को अंजाम दिया है। अल बदर- विभिन्न आतंकी संगठनों की सहायक की भूमिका निभाता है। इसकी स्थापना 1998 में हुई थी।
  • हरकत-उल-अंसार- (एचयूए)  वर्तमान में हरकत-उल-मुजाहीदीन नाम से कुख्यात
  • जैश-ए-मोहम्मसद मुजाहीदीन-ए-तमीम- इसने कश्मीर में कई बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया है। 
  • अल मुजाहिद फोर्स
  • मुस्लिम मुजाहीदीन
  • इस्लामिक स्टूडेंस लीग
  • तहरीक-ए-हर्रियत-ए-कश्मीर 
  • अल उमर मुजाहीदीन
  • जम्मू एंड कश्मीर स्टूडेंस लिबरेशन फ्रंट
  • अल जेहाद फोर्स
  • अल जेहाद
  • जम्मू एंड कश्मीर नेशनल लिबरेशन फ्रंड आर्मी
  • जमायत-उल-मुजाहीदीन (जेयूएम)
  • मुताहिदा जेहाद काउंसिल (एमजेसी)
  • हरकत-उल-जेहाद-अल-इस्लांमी (हूजी)
पाकिस्तान द्वारा भारत में दहशत
  • पाकिस्‍तानी आतंकवादियों द्वारा विभिन्न  आतंकी घाटनाओं में मारे गए भारतीयों की संख्याव करीब 29 हजार।
  • भारतीय सेना द्वारा भारतीय आतंकतियों से बरामद किए गए हथियारों की संख्याय 47 हजार। (2009 तक)
  • पाकिस्ता‍न में प्रशिक्षित आतंकवादियों से बरामद किए गए विस्फोगटकों की मात्रा 60 टन। (2009 तक)
  • जम्मू् एवं कश्मीर में सक्रिय हार्डकोर पा‍क आतंकवादियों की संख्या करीब  2300
  • जम्मू एवं कश्मीर में सक्रिय भाडे के विदेशी आतंकियों की संख्यां करीब 900
  • पाकिस्ता‍न में सक्रिय आतंकी शिविरों की संख्या  करीब 37
  • पीओके में आतंकी शिविरों की संख्यां करीब 49
  • जम्मू  एवं कश्मीकर में पाकिस्तादृनए पाक अधिकृत कश्मीर, अफगानिस्तान, मिश्र, सूडान, यमन, बहरीन, बांग्लादेश, ईरान और इराकी मूल के विदेशी आतंकवादी सक्रिय हैं।
Azhar Masood
पाकिस्तान में छुपे भारत के टॉप टेन मोस्‍ट वांटेड
मौलान मसूद अजहर
जैश.ए दृमोहम्मद का मुखिया। 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमले का मास्टर माइंड। 1 अक्टूबर 2001 को जम्मू एवं कश्मीर विधान सभा पर हमले के केस में भी वांछित। पाकिस्तान के बहावलपुर में रहता है और वहीं से अपनी गतिविधियां संचालित करता है। भारतीय एयर इंडिया के विमान का अपहरण करके अजहर मसूद को आतंकियों ने भारत से रिहा करा लिया।






 


Syed Salahuddin
सैयद सलाहुद्दीन
कश्मीर में सैकड़ों हमलों को अंजाम देने वाले आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहीदीन का मुखिया। पाक अधिकृत कश्मीर  पीओके की राजधानी मुजफ्फाराबाद में रहता है और वहां से अपनी गतिविधियां संचालित करता है।






Hafiz Saeed

हाफिज मोहम्म सईद
लश्कर-ए-तय्यबा का सह-संस्थापक। 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमले के केस में आरोपी। लाहौर के नजदीक स्थित मुरीदके में रहता है और वहीं से गतिविधियां संचालित करता है। 











Ibrahim Athar
इब्राहिम अतहर
मौलाना मसूद अजहर का करीबी सहयोगी। 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट आईसी.814 के अपहरणकर्ताओं में से एक। यह जैश-ए-मोहम्मद का सदस्य है। हाईजैकिंग, अपहरण और हत्या के मामलों में वांछित। पाकिस्ताकन के बहावलपुर में रहता है। 











Zahoor mistry
जहूर इब्राहिम मिस्त्री
हरकत-उल-अंसार वर्तमान में हरकत-उल-मुजा‍हीदीन का सदस्य  1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट आईसी .814 के अपहरण और हत्या के मामलों में वांछित। कराची में रहता हैं और वहीं से आतंकी गतिविधियों को संचालित करता है। 





अयूब मेनन
1993 के मुंबई धमाकों को अंजाम देने में अहम भूमिका। अपने भाई टाइगर मेमन को मुंबई धमाकों में मदद करने का आरोपी। आतंकवाद और स्मनगलिंग के केस में वांछित। कराची में रहता है और वहीं से अपनी गतिविधियां संचालित करता है।
Abdul Razooq
 अब्दुल रज्जाक
1993 के मुंबई हमलों का आरोपी। आतंकवाद और हथियारों की स्‍मनगलिंग में वांछित। कराची में रहता है। 








टाइगर मेनन

1993 के मुंबई धमाकों को अंजाम देने में सबसे मुख्य भूमिका। हत्या, वसूली, अपहरण, आतंकवाद और भारत में हथियारों व विस्फोटकों की स्मगलिंग के मामलों में वांछित। कराची में रहता है और वहीं से अपनी गतिविधियां चलता है। 

Dawood ibrahim
दाउद इब्राहिम
मुंबई अंडरवर्ल्ड  का सरगना। 1993 मंबई में सीरियल ब्लालस्ट  में प्रमुख भूमिका । इन धमाकों में 300 से ज्यादा लोग मारे गए थे। यह हथियारों की आपूर्ति ड्रग्‍स कारोबार से लेकर हत्या और स्मगलिंग के कई मामलों में वांछित है। कराची में रहता है। दुबई से अपनी गतविविधियां संचालित करता है। 




  


छोटा शकील
Chhota Shakil
दाउद इब्राहिम का सबसे करीबी सहयोगी। हत्या, अपहरण, वसूली, फिल्मो स्टारों से ब्लैबकमेलिंग के कई मामलों में वांछित। कराची में रहता है। 





सोमवार, 2 अप्रैल 2012

जीना हो तो .....

.हम बातें बहुत बड़ी-बड़ी करते हैं
लेकिन जीना हो तो,
एक छोटी सी बात नहीं जी पाते हैं
हम दुनिया को खूब अनुभव करते हैं
लेकिन अपने जीवन में,
अनुभव के पल बहुत कम ही आते हैं
वह आदर्शों पर चलें ऐसी उम्मीद करते हैं
लेकिन खुद चलना हो तो,
                                                  सिद्धांतों पर पग डगमग डगमग करते हैं
                                                  सब सम्मान करें ऐसी अभिलाषा करते हैं
                                                  लेकिन बनना हो तो,
                                                  खुद दूसरों के प्रति उदार नहीं बन पाते हैं
                                                  हम देवताओं की कृपा खूब मांगा करते हैं
                                                  लेकिन खुद,
                                                  आचरण से देवता क्‍यों नहीं बना करते हैं
- आशीष कुमार 

शनिवार, 31 मार्च 2012

अज्ञात की यात्रा


मेरा जीवन अज्ञात पहेली, प्रश्‍नों की अविरल धारा सी
भाव, विचार, कर्मों की कडियां, स्वर्णिम धागा बंधन सी
संस्कार, पाप, पुण्य प्रवाह, जन्मों की गठरी बोझिल सी
रिश्‍ते- नाते, धन, प्रेम की दुनिया, मन मोहित दिव्य दृश्‍य सी

सरल जीवन को समझ न पाया, प्रकाशित सत्य को झुठलाया
अंतस के जंगल में भटका, संस्कारों के चुंगल से घबराया
सफलता-असफलता की कसौटी के फेर स्वयं को उलझाया
राजा सुरथ, समाधि वैश्‍य की कहानी को पुनः क्यों दोहराया?

कभी सफलता पर इतराता, कभी भाग्य पर इठलाता है
कभी रूप पर दंभ भरता है, कभी ताकत को दिखलाता है
कभी किसी का बैरी बनता, कभी हितैषी बन जाता है
कभी न समझ में मुझको आता, इसका सत्य स्वरूप क्या है?

हर पल जीवन अज्ञात पथिक सा आगे बढता जाता है
अगला क्षण न जाने तब भी आशा के दीप  जलाता है
समाधान की चाह में भयभीत हो साहसिक कदम उठाता है
जीवन सफल बनाने को पागल सा हो जुटा जाता है
अपने ही सूत्रों से अज्ञात की यात्रा को उलझाता जाता है
- आशीष कुमार

बुधवार, 4 मई 2011

मेरा क्या परिचय पूछ रहे, रचियता , रक्षक, पोषक हूँ

 साभार
मेरा  क्या  परिचय  पूछ  रहे,   रचियता , रक्षक,  पोषक हूँ l
मैं शून्य किन्तु फिर भी विराट,  मै आदि-त्राता, उद्घोषक हूँ ll


मैं एक किन्तु संकल्प किया, तो एकोSहं बहुस्याम हुआ l
... मैंने विस्तार किया  अपना,   ब्रम्हांड उसी का नाम हुआ ll
ये  चाँद  और  सूरज  मेरी,   आँखों  में  उगने   वाले   हैं  l
है  एक  आंख  में  स्नेह ,  और  दूजी  में प्रखर उजाले  है ll

मनचाही सृष्टि रचाने की,  क्षमता वाला मैं कौशिक हूँ |
मेरा क्या परिचय पूछ रहे, रचियता, रक्षक, पोषक  हूँ ll


जिसमे मणि-मुक्तक छिपे हुए , वह सागर  की  गहराई  हूँ l
जिसकी करुणा सुरसरि बनती,  उस हिमनग की ऊँचाई हूँ ll
मेरा  संगीत  छिड़ा  करता , कल-कल करते इन झरनों में l
मैं  सौरभ  बिखराता  रहता ,  इन  रं� �-बिरंगे  सुमनों  4�ें  ll

यह प्रकृति छठा मेरी ही है , इतना सुंदर मनमोहक हूँ l
मेरा क्या परिचय पूछ रहे, रचियता, रक्षक,  पोषक हूँ ll


मेरे चिंतन  की  धारा से,  ऋषिओं  का प्रादुर्भाव  हुआ l
मैंने जब ऋचा उचारी तो, सुरसंस्कृति का फैलाव हुआ ll
मैं याज्ञवल्क्य, मैं ही वशिष्ठ, मैं परशुराम, भागीरथ हूँ l
जो  कभी  अधूरा  रहा नहीं,  मैं ऐसा प्रबल मनोरथ हूँ ll

प्रण पूरा  करने महाकाल हूँ,  कालचक्र  अवरोधक  हूँ l
मेरा क्या परिचय पूछ रहे , रचियता, रक्षक पोषक हूँ ll


जन-हित में विष पीने वाली,  विषपाई मेरी क्षमता है l
जन पीढ़ा से विगलित होती, ऐसी करुणा है, ममता है ll
मैंने साधारण  वानर को , बजरंग  बना के खड़ा किया l
मेरी गीता ने अर्जुन को , अन्याय  मिटाने  अड़ा दिया ll

विकृतियों से लोहा लेने , सुसंस्कृति का सह्योजक हूँ l
मेरा क्या परिचय पूछ रहे , रचियता,रक्षक,पोषक हूँ ll


मैंने संकल्प किया   है  फिर , भू  पर ही स्वर्ग बसाऊंगा l
इस ही  धरती के   मानव को,    शोधूंगा,  देव बनाऊंगा  ll
लाऊंगा मैं उज्वल भविष्य, इसका साक्षी यह दिनकर है l
मेरे  संग  सविता  के  साधक , गायत्री  वाला परिकर है ll

मैं  युग-दृष्टा, युग-सृष्टा ,  युगपरिवर्तन  उद्घोषक  हूँ l
मेरा क्या परिचय पूछ रहे , रचियता,रक्षक,पोषक हूँ ll

                                                                                    
                                                                                          - श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का अंतिम पत्र

शहीद होने से एक दिन पूर्व रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने एक मित्र को निम्न पत्र लिखा -

"19 तारीख को जो कुछ होगा मैं उसके लिए सहर्ष तैयार हूँ।
आत्मा अमर है जो मनुष्य की तरह वस्त्र धारण किया करती है।"

यदि देश के हित मरना पड़े, मुझको सहस्रो बार भी।
तो भी न मैं इस कष्ट को, निज ध्यान में लाऊं कभी।।

हे ईश ! भारतवर्ष में,    शतवार   मेरा  जन्म हो।
कारण सदा ही मृत्यु का, देशीय कारक कर्म हो।।

मरते हैं बिस्मिल, रोशन, लाहिड़ी, अशफाक अत्याचार से।
होंगे पैदा सैंकड़ों, उनके रूधिर की धार से।।
उनके प्रबल उद्योग से, उद्धार होगा देश का।
तब नाश होगा सर्वदा, दुख शोक के लव लेश का।।

सब से मेरा नमस्कार कहिए,

तुम्हारा
बिस्मिल"


रविवार, 24 अप्रैल 2011

जल संरक्षण के लिए धन से ज्‍यादा धुन की जरूरत





बारहमासी हो चुकी जल की समस्‍या गर्मियों में चरम पर होती है। शहरों के गरीब और मध्‍यमवर्गीय तबके में बूंद-बूंद के लिए हाहाकर मचा रहता है। बिडंबना तो यह है कि इस विकराल समस्‍या को गंभीरता से नहीं लिया जाता हैं। सरकारों के  साथ आम जन में भी जल संरक्षण के प्रति संजीदगी  दिखाई नहीं देती है। शायद लोगों को लगता है कि उनके प्रयास से कुछ नहीं होने वाला है।जमीन पर लगातार क्रंकीट की चादर बिछाई जा रही है, जिसके कारण भूमि में पानी के रिसाव पर पहरा लग लग गया है। प्रकृति के अत्‍यधिक दोहन से धरती का गर्भ सूखता ही जा रहा है।
बारिश से पहले पाल बांधने वाला समाज आज बांधों के भंवर में फंस गया है। यहीं कारण हैं कि सूखे को झेलने वाला राजस्‍थान का बाड़मेर बाढ़ के थपेड़ों को सहने को मजबूर है। बिहार को तारने वाले यह बांध अब उसको की डूबाने लगे हैं। अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में आने वाली इन प्राकतिक समस्‍याओं का इलाज है। पहले सामुदियक जल प्रबंधन के तहत लोग बारशि की बूदों को सहजने के लिए अपने घर की छत के जल को नीचे एक कुंड में साफ-सुथरे तरीके से एकत्र करते थे।बरसात का पानी खेत की फसल की जरुरत को पूरा करने के साथ अन्‍य क्षेत्रों के जल के साथ पास के तालाब में इकट़ठा होता था। बाद में इस जल से खेती और घरेलू जल की जरुरतें पूरी की जाती थी रेगिस्‍तानी भूमि में करीब पांच छह फूट नीचे चूने की परत बरसाती पानी को रोके रहती थी बाद में इसका उपयोग पीने व अन्‍य कामों के लिए किया जाता था इस तरह सूखे की मार में यह पाल-ताल समाज को बचाकर रखते थे। अब हम इस तरह सामुदायिक जल प्रबंधन को भूलकर राज्‍य या भारत सरकार के बनाए बांधों की ओर देखने लगे हैं। ये बांध जहां नदियों को बांधकर उनकी हत्‍या करते हैं वहीं, दूसरी ओर बाढ़ लाकर कहर बरपाते हैं।
बांध बनने से सामान्‍य बर्षों में जनता को लाभ मिलता हैलेकिन, बाढ़ आने पर पानी बांध को तोड़कर एकाएक फैलता है। कभी-कभी इसका प्रकोप इतना भयंकर होता है कि चंद घंटों में दस-बारह फूट तक बढ़ जाता है और जनजीवन को तबाह करके रख देता है। बांध बनने से सिल्‍ट फैलने की बजाए बांधों के बीच जमा हो जाती हैइससे बांध का क्षेत्र ऊपर उठ जाता है जब बांध टूटता है तो यह पानी वैसे ही तेजी से फैलता है जैसे मिट़टी का घड़ा फूटने पर बांधों से पानी के निकास के रास्‍ते अवरूद्ध हो जाते हैं। दो नदियों पर बनाए बांधों के बीच पचास से सौ किलोमीटर का एरिया कटोरानुमा हो जाता है। बांध टूटने पर पानी इस कटोरेनुमा क्षेत्र में एकट़ठा हो और इसका निकलना मुश्किल हो जाता है इससे बाढ़ का प्रकोप शांत होने में काफी समय लगता है।
इन समस्‍याओं के चलते बांध बनने से परेशानियां बढ़ी हैं। जाहिर है कि बांध बनाने की वर्तमान पद्धति कारगर नहीं है।सामुदायिक जल प्रबंधन होने से पाल-ताल  बनने बंद हो गए हैं, जिससे हमें साल बाढ़ विभिषका से दो-चार होना पड़ रहा है।
सरकार को चाहिए कि अंधाधुंध बांध बनाने की वर्तमान नीति पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। पहले विकल्‍प में नदियों के पर्यावरणीय प्रवाह को बररार रखा जाना चाहिए दूसरा विकल्‍प उंचे और स्‍थायी बांध बनाने की वर्तमान नीति का है  तीसरा विकल्‍प प्रकृतिप्रस्‍त बाढ़ के साथ जीने के लिए लोगों  को सुविधा मुहैया कराने का है इसमें फ्लड रूफिंग के लिए ऊंचे सुरक्षित स्‍थानों का निर्माण, सुरक्षित संचार एवं पीने के पानी की इत्‍यादि की व्‍यवस्‍था शामिल है,‍ जिससे बाढ़ के साथ जीवित रह सके। धरती के ऊपर बड़े बांधों से अति गतिशील बाढ़ का प्रकोप बढ़ने लगा है। इसे रोकने के लिए जल का अविरल प्रवाह को बनाए रखना होगा। इस काम से ही जल के सभी भंड़ारों को भरा रखा जा सकता है चूंकि, बाढ़ और सूखा एक ही सिक्‍के के दो पहलू हैं।इसलिए इन दानों के समाधान जल का सामुदायिक जल प्रबंधन ताल-पाल और झाल से ही संभव है।

कैद हैं नदियां 
15 अगस्‍त 1947 को मिली आजादी में राष्‍टपिता महात्‍मा गांधी ने जिस आजाद भारत की परिकल्‍पना की थी उसमें प्रकृति को कैद करने की ख्‍वाहिश नहीं  थी।  गांधी के सपने में एक ऐसे भारत की परिकल्‍पना थी जो देश की प्रकृति ओर उसके साथ जीने वाले ग्रामीण को उसका स्‍वराज ओर सुराज दानों दिलाएगा। एक ऐसा भारत जहां समाज और प्रकृति को अपनी जरुरत की पूर्ति क
रने वाले उपहार के तौर पर देखेगा, न कि लालच की पूर्ति करने वाले खजाने के तौर पर। लेकिन, पिछले 64 वर्षों के आजाद भारत के सफरनामे में ऐसा नहीं हुआ। जिस देश में नदियों को कैद करने के लिए दिन- प्रतिदिन एक नई कोशिश चल रही है ऐसे में 15 अगस्‍त के दिन स्‍वतंत्रता अदायगी से ज्‍यादा कुछ नहीं है।
यादि भारत की आजादी को गौरवशाली बनाकर रखना है तो हमें अपनी नदियों के प्रवाह को शुद्ध-सदानीरा, नैसर्गिक और आजाद बनाना होगा। नदियों की आजादी का रास्‍ता नदीं तट पर फैली उसकी बाजुओं की हरियाली में छुपा है भारत की आजदी, बाघ और जानवरों की आजदी रखने वाले जंगलों बचाने और नदियों के स्‍वच्‍छंद बहाव से ही कायम रहेगी।नदियों के किनारे सघन और स्‍थानीय जैव विविधता का सम्‍मान करने वाली हरित पटि़टयों का विकास से संभव है। लेकिन, यह तभी संभव हो सकता है जब नदियों की भूमि अतिक्रमण और प्रदूषण से मुक्‍त हो नदी भूमि का हस्‍तानान्‍तरण और रूपांतरण रुके।
उत्‍तराखंड में भागीरथी पर बांध, दिल्‍ली में यमुना में खेलगांव-मेटो आदि का निर्माण, उत्‍तर प्रदेश में गंगा एक्‍सप्रेस वे नाम का तटबंध, बिहार और बंगाल में क्रमशः पहले से ही बंधी कोसी और हुगली जैसी नदियों को कैद करने का काम ही है। नदी और भूमि की मुक्ति के लिए पिछले कई वर्षों से संधर्ष जारी है लेकिन सरकारें हैं कि बिना सोचे विचारे अपनी जिदपर अड़ी हुर्इ हैं।

समस्‍या के हल के लिए धन से ज्‍यादा धुन की जरूरत 
पानी मुददा है यह सच है। लेकिन, इससे भी बड़ा मुद्दा है, हमारी आंखों का पानी। क्‍योंकि, पानी चाहे धरती के ऊपर को हो या धरती के नीचे का यह सूखता तभी है जब संत, समाज और सरकार तीनों की आंखों का पानी मर जाता है। आज ऐसा ही है वरना पानी के मामले में  हम कभी गरीब नहीं रहे।
आज भी हमारे ताल-तलैये झीलों और नदीयों को सम्रद्ध रखने वाली वर्षा के सालाना औसत में बहुत कमी नहीं आई है। जल संरक्षण के नाम पर धन राशि कोई कम खर्च नहीं हुई। जल संरक्षण को लेकर अच्‍छे कानून और शानदार अदालती आदेशों की भी एक नहीं अनेक मिसाल हैं। वर्षा जल के संचय की तकनीक और उपयोग में अनुशासन की जीवन शैली तेा हमारे गांव का कोई गंवार भी आपको सिखा सकता है। लेकिन, ये हमारी आंखों का पानी नहीं ले जा सकते।
भारतीय संस्‍कृति में समाज को प्रकृति अनुकूल अनुशासित जीवनशैली हेतु निर्देशित व प्रेरित करने का दायित्‍व धर्मगुरूओं का था। तद्नुसार समाज पानी के काम को धर्मार्थ का आवश्‍यक व साझा काम मानकर किया करता था। इसके लिए महाजन धन शासक भूमि व संरक्षण प्रदान करता था। आज सभी अपने-अपने दायित्‍व से विमुख हो गए है। स्‍वंय धर्मगुरूओं के आश्रमों का कचरा नदियों  में जाता हैं समाज सोच रहा है हम सरकार को वोट ओर नोट देते हैं अतः सबकुछ सरकार करेगी। सरकारें हैं कि इनमें पानी के प्रति प्रतिबद्धता कहीं दिखाई नहीं दे रही। सरकारी योजनाओं के पैसे से बेईमान अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। वरना एक अकेले मनरेगा के कार्य ही देश के तालाबों का उद्धार कर देते।

 इतिहास के झरोखे सेः जल संरक्षण के पारंपरिक तरीके आज भी उतने ही कारगर 
 सैकड़ों, हजारों तालाब अचानक शून्‍य से प्रकट नही हुए थे। इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की  तो दहाई थी बनाने वालों की यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ों हजार बनती थी। पिछले दो सौ बरसों में नए किस्‍म की थोड़ी सी पढ़ाई पढ़ गए समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार को शून्‍य ही बना दिया है। इस नए समाज में इतनी उत्‍सुकता ही नई बची कि इससे पहले के दौर में इतने सारे तालाब कौन बनाता थाउसने इस तरह के काम को करने के लिए जो ढ़ाचा खड़ा किया था। आइआइटी का, सिविल इंजीनियरिंग का, उस पैमाने से, उस गंज से भी उसने पहले हो चुके इस काम को नापने की कोई कोशिश नहीं की।
वह अपने गज से भी नापता है तो कम से कम उसके मन में ऐसे सवाल तो उठते कि उस दौर में  कहां थी? आइआइटी? कौन थे उसके निर्देशक? कितना बजट था? कितने सिविल इंजीनियर निकलते थे? लेकिन, उसने इन सब को गए जमाने का गया-बीता काम माना और पानी के प्रश्‍न को नए ढ़ग से हल करने का वादा भी कियाऔर दावा भी। गांवों कस्‍बों की तो कौन कहे, बड़े शहरों के नलों में चाहे जब बहने वाला सन्‍नाटा इस वायदे और दावे पर सबसे मुखर टिप्‍पणी है इस समय के समाज के दावों को इसी समय के गज से नापें तो कभी दावे छोटे पड़ते हैं तो कभी गज ही छोटा निकल आता है।

एकदम महाभारत और रामायण के तालाबों को अभी छोड़ दें तो भी कहा जा सकता है कि कोई पांचवी सदी से पंद्रहवी सदी तक देश के इन कोने से उसे कोने तक तालाब बनते ही चले आए थे। कोई एक हजार वर्ष तक आबाध गति से चलती रही इस परंपरा में पंद्रहवीं सदी के बाद कुछ बाधाएं आने लगी थी। पर, उस दौर में भी यह धारा पूरी तरह से रूक नहीं पाई,सूखा नहीं पाई। समाज ने जिस काम को इतने लंबे समय तक बहुत व्‍यवस्थित रूप में किया था उस काम को उथल-पुथल का वह दौर भी पूरी तरह से मिटा नहीं सका। आठहरवीं और उन्‍नीसवीं सदी के अंत तक भी जगह-जगह पर तालाब बन रहे थे।लेकिन, फिर बनाने वाले लोग भी धीरे-धीरे कम होते गए। गिनने वाले कुछ जरूर आ गए,पर जितना बड़ा काम था उस हिसाब से गिनने वाले बहुत ही कम थे और कमजोर भी। इसलिए ठीक गिनती भी कभी भी नहीं हो पाई।धीरे-धीरे टुकड़ों में तालाब गिने गए पर सब टुकड़ों को कुल मेल कभी बिठाया नहीं गया। लेकिन, इन टुकड़ों कीझिलमिलाहट  समग्र चित्र की चमक दिखा सकती है।

 राज्‍यों की स्थिति 
उत्‍तर प्रदेश 

  • कुल जल निकाय की संख्‍या - 84,647 
  • जल निकायों से धिरा रकबा - 73,053 हेक्‍टेयर 
  • राज्‍य का रकबा - 240.928 लाख हेक्‍टेयर 
  • एक दशक पहले मौजूद जल निकाय - 84,647 
  • एक दशक पहले मौजूद सतह पर मौजूद जल की मात्रा - 12.21 मिलियन हेक्‍टेयर मीटर 
  • सतह पर उपलब्‍ध जल की वर्तमान मात्रा - 12.21 मिलियन हेक्‍टेयर मीटर
  • प्रदेश में औसतन सालाना बारिश - 235.4 लाख हेक्‍टेयर मीटर पानी की बारिश 
  • सिचाई के लिए उपयोग में सतही पानी की हिस्‍सेदारी - 7.8 मिलियन हेक्‍टेयर मीटर 
सरकारी प्रयासः 
  • हर 52 ग्राम सभाओं के बीच कम से कम एक तालाब बनाना है या मौजूद तालाब जीणोद्धार करवाना
हिमाचल प्रदेश
  • जल निकायों की संख्‍या - 7495
  • राज्‍य का रकबा - 55673 वर्ग किमी
  • कुल रकबे की तुलना में जल निकायों की क्षेत्रफल - 35फीसदी
  • एक दशक पहले जल निकायों की संख्‍या - 5,779
  • सतह उपलब्‍ध जल की वर्तमान मात्रा में कमी -  20 फीसदी
  • सिचार्इ के लिए उपयोग लाए जा रहे सतह पर मौजूद पानी की हिस्‍सेदारी-23,507 एसीएम
  • सालाना औसत बारिश - 1300 मिमी
सरकारी प्रयासः 
  • वाटर मैनेजमेंटबोर्ड केतहत रेन हार्वेस्टिंग स्‍कीम, वन, आइपीएच तथा ग्रामीण विकास विभाग काम कर रहा है 
  • नई जल नीति में पनबिजली परियोजनाओं के लिए कम से कम 15 फीसदी पानी छोड़ने की अनिर्वयता का प्रावधान
झारखंड 
  • कुल जल निकायों की संख्‍या - सरकारी 15,746, निजी तालाब 85,849, कुल 1,01,595 
  • पूरे राज्‍य का रकबा - 79714 वर्ग किमी 
  • कुल रकबों की तुलना में जल निकायों का क्षेत्र - 5 फीसदी 
  • सतह उपलब्‍ध जल की मात्रा - 237890 लाख घन मीटर 
  • सतही पानी की सिंचाई में हिस्‍सेदारी - 17 फीसदी 
  • सालाना औसत बारिश - 1100 - 1200 मिमी 
सरकारी प्रयासः 
  • डैम व तालाबों के गहरे करने की योजना
 पश्चिम बंगाल 
  • जल निकायों की संख्‍या - 5.45 लाख 
  • राज्‍य का रकबा -  88752वर्ग किमी 
  • कार्यरत जल स्‍त्रोतों की संख्‍या - 2.93 लाख 
  • धरती पर उलब्‍ध जल की मात्रा - 13.29मिलियन हेक्‍टेयर मीटर 
सरकारी प्रयासः 
  • सदियों पुराने तालाब, झील, तालाब, तड़ाग और अन्‍य जल स्‍त्रोतों को जीवन करने की योजना का प्रारंभ 
  • वर्ष के जल को संरक्षित करने का कार्य 
 उत्‍तराखंड 
  • उत्‍तराखंड को एशिया का जल स्‍तंभ कहा जाता  है, उत्‍तराखंड से बारह बड़ी नदियां और कई सहायक नदियां निकलती हैंराज्‍य औसतन 1200 मिमी होती हैमानसून के दौरान नदियों का जल स्‍तर कई गुना बढ़ जाता है
  • उत्‍तराखंड में कुल 22707 जल प्राकृतिक जल स्‍त्रोत हैंयह एक वर्ष में प्राकृतिक पेय जल स्‍त्रोतों में पचास फीसदी से ज्‍यादा की गिरावट दर्ज की गई जो  कि चिंता का विषय है
सरकारी प्रयासः 
  • सतह पर मौजूद जल निकायों के संरक्षण के लिए वनीकरण 
  • रेन वाटर हार्वेस्टिंग के जरिए जल स्‍त्रोतों को रिचार्ज करने का प्रयास 
जम्‍मू कश्‍मीर 
  • जल निकायों की संख्‍या - 1248 
  • जल निकायों का रकबा - 291.07वर्ग किमी 
  • राज्‍य का रकबा - 222236 वर्ग किमी 
  • एक दशक पहले जल निकायों की संख्‍या - 38 
  •  सिचाई में प्रयोग किए जा रहे सतही की हिस्‍सेदारी - 25 फीसदी 
  • सालना औसत बारिश -998 मिमी
सरकारी प्रयासः 
  • सतह पर मौजूद जल और जल निकायों के संरक्षण के लिए फरवरी 2011 में वाटर रिसोर्सेस एक्‍ट लागू किया गया एक्‍ट के मुताबिक सरकार पनबिजली परियोजनाओं से किराया बसूलेगी पानी का किराया दोगुना करने के साथ पानी के मीटर लगाने की भी तैयारी है ताकि लोग जरूरत के मुताबिक ही पानी खर्च करें
बिहार 
  • कुल जल स्‍त्रोतों की संख्‍या - 20938 
  • राज्‍य का रकबा - 94163 वर्ग किमी 
  • कार्यरत जल स्‍त्रोतों की संख्‍या - 17683 
  • सतह पर मौजूद जल - 34053घन किमी 
सरकारी प्रयासः 
  • मौर्य काल 327-297 ई पूर्व निर्मित सिंचाई स्‍त्रोत आहर, पइन, व तालाबों को पुनजीर्विजत करने की योजना पर काम शुरू 
  • नदी जोड़ योजना पर काम जारी 
देश में सतह पर मौजूद जल की स्थिति 
  • 14 प्रमुख नदियां, 44 मझोली नदियों और छोटी-छोटी धाराओं में सालाना 1645 हजार मिलियन क्‍यूबिक मीटर (टीमएमसी) पानी बहता है 
  • हर साल 3816 टीमएमसी पानी बारिस से प्राप्‍त होता है 
  • हिमालय क्षेत्र में स्थित 1500 ग्‍लेशियरों की कुल बर्फ का आयतन करीब 1400 घन किमी 
  • जम्‍मू कश्‍मीर में डल और वुलर, आध्र प्रदेश में कोलेरू, उडीसा में चिलका, तमिलनाडु की पुलीक‍ट जैसी कई बड़ी प्राकृतिक झीलें हैं
पर्यावरण संरक्षण पर विशेष वीडियो, जरूर देखें